रतनपुर की हवेली आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है । जब से इसके मालिक राजा रतनसेन सपरिवार विदेश गए हैं थे । विदेश भ्रमण के लिए यह परिवार समय –समय पर जाता ही रहता था । ऐसा पहली बार ही हुआ है कि उस हवेली के चौकीदार की उनके जाने के चौथे दिन ही हत्या हो गई । उसके बाद कोई भी चौकीदार वहाँ रहने को तैयार नहीं हुआ । सब डरने लगे हैं ।कोई भी इतनी हिम्मत नहीं जूटा पाया कि कोई रात में राजा रतन सेन की हवेली में रुक सके । ग्राम प्रधान भी इस मामले में कुछ न कर सके । जान तो सबको प्यारी है,  कोई भी अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहता । ग्राम प्रधान ने चार लठैतों को तैयार किया जो हवेली पर रात में पहरा दे सकें, लेकिन आधी रात के बाद उस हवेली से आने वाली विभिन्न आवाजों ने उन्हें इतना डरा दिया कि वे रात में ही हवेली छोड़ कर ग्राम प्रधान के घर की ओर दौड़ पड़े ।

रतनपुर की हवेली के किस्से अब रतनपुर से निकल कर आस –पास के गाँव में भी फैलने लगे । बात फैलते –फैलते वैंकू, तनुष, आशीष और रुहिन के पास भी पहुँच गई । सब एक नए मिशन को पाकर खुश हो गए और दौड़ते हुए मोची अंकल के पास जा पहुंचे । मोची अंकल बच्चों को देख कर खुश हो गए । वे भी आज कुछ ज्यादा प्रसन्न लग रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे वह बच्चों को कुछ बताने के लिए उत्सुक थे । जब बच्चों ने उन्हें बताया कि वे इस बार भूतों से लड़ने या कहिए भूतों से लोगों को बचाने के लिए जा रहे हैं । मोची अंकल ताली बजाते हुए बोले –

“या खुदा !तभी अल्लाह ने मुझे नई टैक्नीक (विधि )सुझाई है …..मैं तुम सबको बुलाने वाला ही था ……परवरदिगार ने तुम्हें खुद ही यहाँ भेज दिया”

“क्या अंकल ! आपको नई टैक्नीक आ गई है !” वैंकू ने उत्सुकता से पूछा ।

“कैसी टैक्नीक ….किसकी टैक्नीक ?”रुहिन ने बीच में ही पूछा

“जूतों की नई टैक्नीक ! मोची अंकल ने आँखें झपकाते हुए कहा

“जूतों की नई टैक्नीक !”तनुष ने आश्चर्य से पूछा

“हाँ भाई ! तुम भी चकित रह जाओगे ….मोची अंकल हँसते हुए बोले ।

“अंकल प्लीज जल्दी से दिखाओ न !”वैंकू ने  जिद की

इस बार मैंने तुम लोगों के लिए ऐसे जूते बनाए हैं जिन्हें पहन कर तुम छुप जाओगे ।

“क्या !” सारे बच्चे एक साथ चिल्लाए

“कैसे छुप जाएंगे …..अंकल ठीक से बताओ न !आशीष ने कुछ न समझ पाने से झुँझलाते हुए कहा

“छुप जाने का मतलब है कि आपको कोई नहीं देख सकेगा और आप सब कुछ देख सकेंगे” ।

“वाह अंकल !ये हुई न अच्छी बात ! बिलकुल मिस्टर इंडिया की तरह । हम लोग भी उनकी तरह कार्य कर सकेंगे ।

“हाँ –हाँ बिलकुल वैसे ही ……”मोची अंकल बोले ।

सारे बच्चे खुशी से झूम उठे और मोची अंकल को पकड़ करचिल्लाने लगे

“अंकल ….दिखाओ न जल्दी ….”

“अभी रुको ….. मुझे अपना चमत्कारी आइटम निकालने तो दो”अंकल पान चबाते हुए बोले

बच्चे शांति और उत्सुकता से मोची अंकल की हरकतों को देख रहे थे । मोची अंकल ने जब जूते बच्चों के सामने रखे तो वे उनकी सुंदर बनावट देख कर दंग रह गए । मोची अंकल ने एक नीले रंग के बटन की ओर इशारा कराते हुए बताया – “जब तुम इसे दबाओगे तो यह सफ़ेद रंग का हो जाएगा, फिर तुम्हें कोई नहीं देख सकेगा ……लेकिन तुम सब कुछ देख सकोगे ….जब भी तुम्हें अपने आप को दिखाना हो तब यह सफ़ेद बटन फिर से दबाना जब यह नीला हो जाएगा तब तुम्हें सब देख सकेंगे ।

बच्चे अपने जूते प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठे । मोची अंकल ने बच्चों को उनके अलग –अलग नाप के अनुसार जूते दिए और उनके अगले मिशन के लिए दुआ की और अपने बनाए चौकलेट भी खाने के लिए दिए । सभी बच्चे अपने घर की ओर दौड़े …..कूदते – फाँदते घर पहुंचे,  उनके दिमांग में अपने अगले कार्य की हल-चल मची हुई थी ।

बच्चों ने अपने माता –पिता को अपने नए जूतों के बारे में बताया । उन्होंने बच्चों को समझाया कि प्रत्येक कार्य को सावधानी और विचार पूर्वक करना चाहिए और इन जूतों का प्रयोग करते समय विशेष ध्यान रखना ….कहीं खेल में मत पड़ जाना, अपने काम पर ध्यान देना ।

अंधेरा छाते ही बच्चे रतनपुर की ओर चल पड़े । बच्चों ने हमेशा की तरह कुछ खाने – पीने का सामान, रस्सी, टॉर्च, पटाखे चलाने वाली बंदूक आदि अपने साथ रखे । रुहिन और मोची अंकल जैनी का विशेष ध्यान रखते थे । मोची अंकल ने जैनी के भी जूते बना दिए थे । रुहिन ने उसे पहनते हुए कहा –

“आज हम भूत – पिशाचों का सामना करने जा रहे हैं”

जैनी ने सारे बच्चों को ध्यान से देखा और ज़ोर – ज़ोर से पूंछ हिलाने लगी ।

सभी बच्चे रतनपुर गाँव के ऊपर कुछ ही देर में पहुँच गए । रात के लगभग नौ ही बजे थे । उन्हों ने चारों ओर नजर दौड़ाई । गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था । शायद उस गाँव में अभी तक बिजली नहीं आई थी । कहीं –कहीं पर दिये टिमटिमा रहे थे । लंबे-लंबे वृक्ष किसी विशालकाय पिशाच जैसे ही लग रहे थे । कोई भी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था । गाँव की एक चौपाल पर कुछ लोग हुक्का पी रहे थे और बातें कर रहे थे । कभी –कभी कोई कुत्ता भौंक उठता था । हवेली के एक भाग में हल्का उजाला दिखाई दे रहा था । शेष हवेली अंधकार में डूबी हुई थी।

बच्चों ने अपने जूतों का नीला बटन दबाया और हवेली की ऊंची दीवार तक उड़ते हुए हवेली के आहाते में उतर गए । उन्हें कोई देख नहीं सकता था इसलिए वे निश्चिंत थे । जब वे अंदर पहुंचे तो कुछ अजीब सी परछाइयाँ दिखी । वे थोड़ा डर भी गए लेकिन जल्दी ही सँभल गए । उन्हों ने पास जाकर देखा तो हैरान रह गए …..कुछ लोगों ने भूतों जैसे मुखौटे पहने हुए थे । उनकी आवाजें मनुष्यों जैसी ही थीं । वे धीरे –धीरे बातें कर रहे थे । वे एक बरामदे में सिगड़ी पर कुछ पका रहे थे । बच्चे उनके आस –पास ही निगरानी करने लगे और ध्यान से उनकी बातें सुनने लगे । रुहिन ने साथ लाए छोटे से डिट्टा फोन को ऑन कर लिया ।

उन व्यक्तियों में से एक बोला –

“अब तो गाँव वालों को इस हवेली से डर लगने लगा है । दिन में भी कोई इधर नहीं आता”

दूसरा बोला –“सब इसे भुतहा हवेली कहने लगे हैं”

“जब रतन सेन जी आएंगे तब क्या होगा ? वे तो इस हवेली को डर से छोड़ने वाले नहीं”एक अन्य व्यक्ति ने शंका व्यक्त की ।

“अरे !आज कल अपने बच्चों की भलाई के लिए लोग सब कुछ करने के लिए तैयार हो जाते हैं”

“तुम सही कह रहे हो भैया ….हमें कुछ दिनो इस अफवाह को और हवा देने की जरूरत है । जिससे लोगों का विश्वास दृढ़ हो जाए”

एक दूसरे व्यक्ति ने अपना मशवरा दिया ।

बच्चे चुपचाप उनकी बातें सुन रहे थे । उन्हें समझते देर न लगी कि इन लोगों का विचार इस हवेली पर कब्जा करने का है, जिससे वे इस हवेली को “भुतहा हवेली” बनाने के प्रयास में लगे हैं । बच्चों ने पहले सोचा कि इन्हें पटाखा चला कर डरा दें, लेकिन रुहिन ने उन्हें ऐसा करने से मना किया । तब तक बात कुछ और आगे बढ़ी ।

एक व्यक्ति ने कहा –

“कितने तक में यह हवेली बिक जाएगी ?”

“चार – पाँच करोड़ में तो बिक ही जाएगी”

“गाँव में इतने पैसे कोई नहीं देगा”

“भू माफिया वाले तो पहले से ही पीछे पड़े हैं,  उन्हें ही बेच देगें”

“और कोई भुतहा हवेली को तो खरीदेगा ही नहीं !”

“अरे सब खरीद लेते हैं ….आज के जमाने में कोई नही मानता भूत –प्रेत को”

उसका इतना कहना था कि सभी ज़ोर से हँस पड़े । उनमें से एक आदमी बोला –“अरे !नहीं मानते तो फिर डरते क्यों हैं ?”

“गाँव के हैं इसलिए ….. पढ़ –लिख गए फिर वे भी नहीं मानेंगे”

वे बातें कर ही रहे थे कि वैंकू और तनुष ने उन्हें रस्सी से बांधना शुरू किया ….वे चिल्लाने लगे ….भूत …..भूत ….. बचाओ …… बचाओ …..

बच्चे उन्हें भूत –भूत कह कर चिल्लाते हुए देख कर हँसे जा रहे थे । उन लोगों को कोई दिखाई नाही दे रहा था इसलिए वे बहुत ही डरे हुए थे और वे रस्सियों में बंधते भी जा रहे थे । डर और भय से उनकी चीखें निकल रही थीं । वैंकू ने आशीष को पुलिस लाने का इशारा किया ।

बंधकों की चीख –पुकार से सारा गाँव जग गया, लेकिन कोई भी पास आने की हिम्मत न कर सका । लोग पहले से ही हवेली से डरे हुए थे, अब तो उनका और भी बुरा हल था । सभी एकत्र होकर हवेली के पास आ गए । वैंकू, रुहिन और तनुष ने सातों आदमियों को रस्सी से अच्छी तरह बांध दिया और उनके मुंह पर टेप भी लगा दिया । गाँव के लोग टॉर्च लगा –लगा कर उधर देखने का प्रयत्न करने लगे । तभी पुलिस की जीप की आवाज आई और कई पुलिस वाले एक साथ नजर आए आशीष उनके साथ था ।

बच्चों ने अपने जूतों का सफ़ेद बटन दबाया नीला बटन होते ही वे सबको दिखाई देने लगे । बच्चे उन आदमियों को खींचते हुए बाहर लाए । पुलिस वाले बच्चों को यह काम कराते देख कर हैरान रह गए । गाँव के लोग चकित थे । पुलिस ने उन्हें कब्जे में लेलिया । थानेदार ग्राम प्रधान को देख कर आश्चर्य चकित होकर बोला –

“प्रधान जी आप भी इनमें शामिल हो”

प्रधान जी ने सिर झुका लिया ।जैनी उन पर बार –बार भौंक रही थी ।

वैंकू ने कहा –“ये ही तो आधुनिक भूत –प्रेत हैं जो जनता को परेशान कराते हैं”

पुलिस बंधकों को लेजा रही थी और गाँव वाले बच्चों के साथ नाच रहे थे ।

शब्द – अर्थ

लालायित होना – किसी चीज को प्राप्त करने की इच्छा करना ।

आहाते – खुली जगह

अफवाह –झूठी खबर