आए दिन आतंकवादियों के द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या से सारा भारतवर्ष परेशान था । खोज बीन से यही जानकारी उभर कर सामने आती कि ये आतंकवादी हमारे पड़ोसी देश से आते हैं । कभी वे पहाड़ी रास्ते से सीमा रेखा को पार कर आते हैं तो कभी वे समुद्र के रास्ते से भारत में प्रवेश करते हैं । पड़ोसी की सेना का इसमें पूर्ण सहयोग होता है । आतंकवादियों को प्रवेश कराने में वे सीस फायर का भी उल्लंघन करते हैं । वे जानते हैं कि युद्ध करके तो कभी जीत नहीं सकते इसलिए भारतीयों को परेशान करने का यह तरीका ढूंढ निकाला । कभी होटलों पार आतंकवादी हमला होता है कभी सुरक्षा बलों की टीम पार घात लगाकर हमला किया जाता है, कभी बस में सवार निर्दोष लोगों को मौत की नींद सुला दिया जाता है ।

वैंकू और उनके दोस्तों ने निश्चित कर रखा था कि अब वे आतंकवादियों को किसी ऐसी घटना को अंजाम न देने देंगे । जैसे ही यह खबर फैली कि कुछ आतंकवादी समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश करने की कोशिश कर सकते हैं,  तो वैंकू और उसकी टीम अपने मिशन पार निकल पड़े । सूर्योदय होते ही वे अपने प्रिय मोची अंकल के पास जा पहुंचे । उन्हें देख कर मोची अंकल की बांछें खिल जाती और वे नए उत्साह से भर जाते । वे बच्चों का भी उत्साह वर्धन करते । उन्हों ने अब वैंकू, तनुष, रुहिन और आशीष का नाप ले रखा था । वे उसी नाप के तरह –तरह के जूते बनाते जो उन्हें आकाश और पाताल में भी उड़ने में सहायक होते । बच्चों ने अपने – अपने जूते लिए । रुहिन जैनी के जूते लेना न भूली सब ने मोची अंकल से आशीर्वाद लिया और अपने मिशन पर निकल पड़े ।

सबने विचार किया कि उन्हें आज ही दक्षिण भारत की ओर निकल पड़ना चाहिए । जिससे आतंकवादियों को कोई मौका न मिल सके, हमारे देश में आने का। अंधेरा होते ही उन्हों ने अपने जादुई जूते पहने और दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान किया । तेज गति से चलने पर भी उन्हें दो घंटे का समय लग गया । वे सभी अपनी इस मनोहारी यात्रा से बहुत खुश थे,  क्योंकि उन्हें काफी देर तक आकाश में रहने का मौका मिला । वे विभिन्न शहरों के ऊपर से गुजरते हुए चले जा रहे थे । रात में शहर ऐसे लग रहे थे जैसे एक आकाश तारों से भरा हुआ जमीन पर भी हो । बिजली के चमकते अलग –अलग रंग के बल्व सितारों की तरह झिलमिल कर रहे थे । लंबी –लंबी स्ट्रीट में लगी लाइट आकाश गंगा का भ्रम पैदा कर रही थीं । अद्भुत नजारा था ….. मन कर रहा था कि सुबह न हो और वे इसी सुंदर वातावरण में विचरण करते रहें । लेकिन उन्हें पता था कि वे अपने मनोरंजन के लिए नहीं निकले कुछ विशेष कार्य करने के लिए निकले हैं । इसलिए वे रात में ही समुद्र का किनारे पहुँच गए । उन्होने रात्रि में देखने वाली दूरवीन निकाली और अपने –अपने कार्य मे लग गए । उनकी सहायता के लिए पुलिस और नेवी के अफसरों को भी बता दिया गया था । इन बच्चों के अनोखे कारनामों की वजह से सब उन्हें जान गए थे ।

तनुष ने अचानक अपनी टॉर्च से संकेत किया । सभी मित्र जल्दी से उधर पहुँच गए । उसने कहा –”देखो उस दिशा में ….वहाँ पानी में कुछ हलचल दिखाई दे रही है । यद्यपि वहाँ पर कोई जहाज दिखाई नहीं दे रहा था । । बच्चों ने समझ लिया कि वहाँ कोई पनडुब्बी हो सकती है । फिर तो वे बिना वक्त गँवाए उधर उड़ चले । आज तो उनके पास अद्भुत शक्ति थी क्योंकि आज मोची अंकल ने समुद्र के अंदर अपनी उड़ान को बनाए रखने वाले जूते दिए थे । उनके प्रयोग के लिए भी वे उत्सुक थे । आशीष और रुहिन ने पानी के अंदर जाने का इरादा किया । उन्हों ने अपने ऑक्सीज़न के मास्क लगाए और पानी में उतर गए । तनुष और वैंकू  समुद्र के ऊपर रह कर उनके संकेत का इंतजार करने लगे । जैनी भी अपनी चमकती आँखों से सब कुछ बड़े धैर्य से देख रही थी ।

दूर–दूर तक कहीं कोई दिखाई नहीं दे रहा था । समुद्र का गहरा नीला रंग कुछ डरावना ही लग रहा था, लेकिन उसकी लहरें शांत भाव से एकरूपता लिए हुए बह रहीं थीं । अचानक वैंकू को कुछ संकेत मिला ….. वह भी तनुष और जैनी के साथ पानी में उतर गया । रुहिन ने उन्हे दिखाया –

“ये देखो! पानी में तैरते हुए पत्थर …..ये पत्थर छोटे नहीं आकार में काफी बड़े थे”सभी बच्चों ने उन्हें ध्यान से देखा ।उन्हें लगा कि कहीं ये राम सेतु के पत्थर तो नहीं । वे लंका के तट पर बसे नगर जाफना के तट पर पहुँच गए थे । अब तो उन्हें यह पूर्ण विश्वास हो गया कि सदियों पहले जो नल और नील ने पत्थरों से सेतु बनाया था ये पत्थर उसी सेतु के अवशेष होंगे । इतिहास से ये प्रमाणित है कि वे पत्थर पानी पर तैरने की विशेषता रखते थे । ये पत्थर अन्य पत्थरों से अलग भी दिख रहे थे । ये भार में भी हल्के थे । इनमें स्व निर्मित रोम छिद्र जैसे छेद  थे जो इन्हें न सिर्फ हल्का बना रहे थे बल्कि इसके कारण ही ये तैरने में सक्षम थे । इन पत्थरों का रंग भी अन्य पत्थरों की तरह नहीं था । ये पत्थर नीलिमा लिए हुए थे । किसी –किसी पत्थर पर तो राम का नाम भी पढ़ा जा सकता था । आश्चर्य के साथ–साथ बच्चों को अपने इतिहास पर गर्व और ईश्वर पर आस्था बढ़ती जा रही थी ।

दादा–दादी और नाना –नानी से सुनी कहानियाँ सच होती दिखाई दे रहीं थीं । राम और रावण अब काल्पनिक पात्र नहीं रहे । वे भी उनकी तरह जीते –जागते थे । साथ ही यह भी गर्व हुआ कि जिस तरह उन्होंने यहाँ पर राक्षसों का वध किया था उसी तरह वे भी यहाँ आधुनिक राक्षसों का वध करने आए हैं । उनकी तरह हमारी भी विजय अवश्यंभावी है । रुहिन बोली –

“क्या सभी दुष्ट आत्माएँ दक्षिण में ही होती हैं । तभी तो नानी कहानी में बार- बार कहतीं थीं कि व्यापार करने सब दिशाओं में जाओ, पर दक्षिण में मत जाना।

“रुहिन कहानियों की सारी बातें सच नहीं होती” आशीष ने बताया ।

रुहिन ने प्रतिवाद किया – “तुम बड़े अजीव हो, यदि तुम्हारे मन के अनुसार हो तो सत्य है अन्यथा असत्य”

तनुष ने रुहिन के हाँ में हाँ मिलाई –“बिलकुल …. अभी ये बोलेगा कि राम सेतु था ही नहीं”

“जब भी ऊंचाई से इस स्थान की फोटो ली जाती है तो एक लाइन इस राम सेतु की अभी भी आती है” रुहिन ने फिर कहा

“हाँ भई ! समझ गया मैं कि इस मामले में तुम्हारी जानकारी ज्यादा है” आशीष ने हार मानते हुए कहा

“इस मामले में ही नहीं,  हर मामले में” रुहिन ने हँसते हुए कहा

“हाँ ….हाँ …मेरी दादी मैंने मान लिया …”

“अब बहस ही करते रहोगे या आगे कार्य करोगे?” वैंकू ने दोस्तों को टोका

सभी आगे बढ़ चले …..रुहिन ने कुछ तैरते पत्थर अपने बैग में डाल लिए ।

बच्चे तो पानी के अंदर तैर ही रहे थे कि उन्हें कुछ शार्क जैसा दिखा …. वे सब इकट्ठे हो गए और ध्यान से उसकी गति विधि को देखने लगे ….. वे समझ गए कि ये शार्क नहीं ….कोई पनडुब्बी है । वे अलग–अलग दिशाओं में फैल गए । और उसे घेरने का इरादा किया । अब वे उसके पास ही पहुँच गए …… चारों ओर शांति थी ……किसी को बच्चों के आने की खबर न हुई ….अभी सब विचार ही कर रहे थे कि अगला कदम क्या उठाएँ ….कि अचानक जैनी एक वाल्व की ओर लपकी और देखते ही देखते उसमें घुस गई । फिर क्या था सबको रास्ता मिल गया और सबने उसमें प्रवेश कर लिया । वे जिस चैंबर से निकले उसमें हथियारों का जखीरा था । बंदूकें, पिस्तौल तो थी हीं हथगोले तो भरे पड़े थे । यही नहीं चैंबर की दीवारों पर टंगी बैल्टों में भी ऑटोमैटिक हथियार फिट थे । लग रहा था जैसे वे आक्रमण की पूरी तैयारी करके आए हैं । आवश्यकता पड़ी तो वे आत्म्-घात करने से भी नहीं चूकेंगे । फिदायीन होने की तथाकथित तैयारी करके वे उस काल्पनिक दुनिया में जा सकें जो उनके आकाओं ने रचाई थी । कितने अजीव लोग होते हैं इस दुनिया में जो दूसरों को बलि का बकरा बनाने के लिए उन्हें मन गड़ंत झूठी–झूठी बातें बता कर उन्हें मरने के लिए उकसाते हैं । जिससे किसी का भी भला नहीं होता…..  न मरने वाले का न मरवाने वाले का …. । निर्दोष लोगों को मारने से भला किसका भला हो सकता है !

चारों बच्चे दूसरे चैंबर में घुसे …… वहाँ उन्हों ने देखा कि कुछ आदमी लंबी –लंबी दाढ़ी–मूंछों वाले, गहरी बेफिक्री की नींद सो रहे थे । रुहिन ने अपने बैग से एक छोटी सी बोतल निकाली जिसमें ऐसा पदार्थ था जो सांस के साथ अंदर जाते ही व्यक्ति को दो – तीन घंटे के लिए गहरी नींद में सुला देता है । वैंकू ने इसका सावधानी से प्रयोग किया,  आशीष ने इस कार्य में उसकी सहायता की । थोड़ी देर में सब गहरी नीद में चले गए । फिर सभी बच्चों ने मिलकर उनकी कमर से मजबूत रस्सी बांधी, उनके ऑक्सीज़न मास्क लगाया और उन्हे पानी में खींच लिया । पनडुब्बी तेजी से आगे बढ़ गई जिसकी सूचना उन्हों ने तट रक्षकों को दे दी । जादुई जूतों की मदद से वे उन आदमियों को भी ऊपर ले आए …..हवा में उड़ते हुए वे शीघ्र तट पर आ गए । लोगों ने जब उनके साथ उड़ते हुए पाँच अन्य लोगों को देखा तो हैरान रह गए । उनको डाक्टर की निगरानी में सुरक्षेत स्थान पर छोड़ दिया । कुछ ही देर में लोगों ने समुद्र में आग का गोला उठते हुए देखा …..वैंकू और दोस्त समझ गए कि ये पनडुब्बी की अंतिम साँसों का सबूत है  ।

सूर्य के प्रकाश के साथ बच्चों के कारनामों के यश का प्रकाश भी चारों ओर फैल रहा था ।

शब्द – अर्थ

बांछे खिलना – खुश होना (मुहावरा)

रोम छिद्र – रोएँ जैसे छेद

अवश्यंभावी – निश्चित संभव होना

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