लोक गीत
क्रत्रिमता और आडम्बर से दूर जन -मानस के नैसर्गिक उद्गार ही लोक गीत हैं | लोक गीतों में प्राकृतिक संगीत का इतिहास व्याप्त रहता है | यह जीवंत काव्य
है |शिक्षित तथा सभ्य मनुष्य की संगीतमयी और कलापूर्ण अभिव्यक्ति को कविता कहा जाता है |लोक गीत तो अशिक्षित जनता के भावुक तथा संवेदन शील हृदय के
स्वाभाविक उद्गार हैं |जो अवसर पा कर संगीत की बलवती धारा के रूप में प्रवाहित हो उठते हैं |

लोक गीतों का कोई छंद -विधान नही होता | माटी की महक ,संस्कारों के स्वर और अंतर की आवाज होती है | लोकगीत हृदय के खेत में उगते हैं |सुख के गीत

उमंग के जोर से जन्म लेते हैं |दुःख के गीत अवसाद की भंगिमा से पनपते हैं और आंसुओं के साथी बनते हैं |

वास्तविक जीवन की समस्या के लिए लोकगीत ही वास्तविक ग्रन्थ हैं |वे मानव हृदय के प्रष्ठों पर सदियों से अंकित हैं |

बारह -मासा ,कजरी ,फाग ,देवी गीत ,कन्या दान ,भावर ,सौहर ,ज्योनार ,आदि इसके प्रमाण हैं |ये हमारी संस्कृति के दस्तावेज हैं |लोक गीतों का अस्तित्व आदिम –

जाति की तरह पुरातन है |लोक गीत ,लोक जीवन के अलिखित दस्तावेज हैं |

श्री राम के जन्म ,विवाह ,वनवास और राम राज्य के गीत हम आज भी सुनते हैं |कृष्ण का दधि खाना ,सखियों के संग रास रचाना ,सुदामा संग प्रीत बढ़ाना ,भक्तो

की रक्षा करना आदि आज भी समाज में व्याप्त हैं |

यदि भारत को समझना है तो उसके लोक गीतों में झाँके वहीं सच्चे भारत के दर्शन होंगे |