पाठ-5

एक कहानी यह भी

प्रश्न 1: लेखिका के व्यक्त्वि पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?

उत्तर: लेखिका के व्यक्तित्व पर उनके पिता जी और हिन्दी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का प्रभाव पड़ा। वह भी अपने पिता की तरह कुछ विशिष्ठ करने में रूची रखती है, उनमें भी काफी क्रोध है और साथ ही साथ एक तरह का रौप भी है जो कि उनके कालेज में देखा जा सकता था। शीला अग्रवाल के द्वारा उनकी साहित्य के प्रति रूची बढ़ी। स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए उन्हें प्रेरित किया और देश भक्ति की भावना जगाई। उन्होंने पूरे जोश से संग्रामों में भाग लिया। उन्होने उनको (लेखिका) घर की चार दिवारी के बीच बैठकर देश की स्थितियों को जानने समझने के सिलसिले को खींच कर उन स्थितियों की सक्रिय भागीदारी में बदल दिया। शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने रगों में बहते खून को लावे में बदल दिया और उन्हें देश की आजादी और अपनी मातृभमि का महत्व समझाया।

प्रश्न 2: इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भव्यिारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है?

उत्तर: इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भव्यिारखाना’ कहकर इसलिए संबोधित किया क्योंकि उनका मानना था कि रसोई का काम एक अनपढ़ व्यक्ति भी भखूबी कर सकता है। वह विशिष्ट कार्य करने में रूची रखते थे और चाहते थे कि उनकी बेटी भी कुछ विशिष्ट कार्य करे, कोई अच्छा हुनरवादी विशिष्ट कार्य की प्रमुखता सीखे और योग्य बने। उनका मानना था रसोई में काम करना समय की बरबादी है। इसलिए वह अपनी बेटी को रसोई से हटकर विशिष्ट कार्यों में रूची बढ़ाने की कोशिश करते जैसे-देश में चारों ओर क्या कुछ चल रहा था, स्वतंत्रता संग्राम के समय। हुनर सीखने वाले कार्यों को अधिक महत्व देते। उनके अनुकूल रसोई में अपनी क्षमता और प्रतिभा को भट्टी में झोंकने के समान है।

परंतु आज परिस्थितियाँ बदल गई है। अब समाज में काफी परिवर्तन आ गया है और रसोई का काम सीखना भी काफी बड़ा हुनर बन गया है। आजकल ‘शैफ’ बनने के हुनर को भी काफी महत्व दिया जाने लगा है।

प्रश्न 3: वह कौन सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?

उत्तर: लेखिका के पिता जी को एक बार उनके प्रिंशिपल द्वारा बुलाया गया था। उनके पिता चिंतित हो गए। क्योंकि उनकी बेटी की गतिविधियों के बारे में बताया जाने वाला था। वह कालिज गुस्से से भन्नाते हुए गए। लेखिका अपने पिता के गुस्से से बचने के लिए पड़ोस की एक मित्र के पास चली गई और माँ को कह दिया कि जब पिता जी का गुबार निकल जाए तब बुलाना। कालेज में उनके पिता को उनके अन्य विद्यार्थियों पर रौब के बारे में पता चला। लेखिका के एक ही इशारे सारा कालिज चल रहा था और इसलिए प्रिंलिपल परेशान थी और यह आग्रह कर रही थी कि वह अपनी बेटी को घर पर बिठा ले। प्रिंसिपल के लिए कालिज चलाना मुश्किल हो गया था। परंतु इस पर उनके पिता जी को उनपर अधिक प्रसन्नता ‘व’ गर्व महसूस हुआ। ज बवह खुशी-खुशी घर लौटे और डरी लेखिका ने उन्हें देखा, तो उन्हें विश्वास न हुआ और वह आव्क (शांत) रह गई। इस घटना पर लेखिका को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ और न ही अपने कानों पर। वह यह सुनकर अचम्बे में रह गई कि उनके पिता उनसे बहुत खुश है। उनके पिता को लगा कि अब उनकी बेटी लायक, योग्य हो गई है और उनमें रूतबा आ गया है, सभी छात्राएँ उनका सम्मान करते है और उनका काफी प्रभाव था कालिज में।

प्रश्न 4: लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: लेखिका को अपने पिता की कुछ बातें अच्छी नहीं लगती थी। जैसे कि –

1. अंतर्विरोध करते थे – वह विशिष्ट बनने और बनाने में ज्यादा महत्व देते और दूसरी ओर सामाजिक मर्यादाओं का भी पालन करने पर जोर देते। वह विराधों (अंतर) से गुजरते, यह जानते हुए कि इन दोनों का रास्ता ही टकराहट का है।

2. रूप को ज्यादा महत्व देना – लेखिका काली थी। उनकी बड़ी बहन काफी सुंदर, सुशील, हँसमुख, गोर, स्वस्थ थी। पिता का ज्यादा ध्यान उनकी बड़ी बहन की ओर था और उनकी शादी के उपरांत ही उनके पिता का ध्यान उनपर गया।

3. माँ पर रौब डालना – लेखिका के अनुकूल उनके पिता उनकी माँ पर रौब रखते और जयादती करत और उन्हे उनका (पिता) स्वभाव अच्छा नहीं लगता था।

4. दोस्तो की बातों को ज्यादा महत्व देते और उनकी बातों को सुनकर उनका गुस्सा बढ़ता तो कभी घटता। वह ओरों की बातों को महत्व देते थे।

प्रश्न 5: इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।

उत्तर: 1945-1947 राजनैतिक आंदोलनों से भरा हुआ था। माहौल, राजनीति, नारों, हड़तालों से भरा था। उस समय स्थितियाँ प्रभाव-फेरियाँ, जुलूस, भाषण से भरी थी और दमखम और जोश-खरोश के साथ सबसे जुड़ना हर युवा का उन्माद (खींचे चले जाना) था। युवा पीढ़ी का स्वातंत्रता आंदोलनों में विशेष योगदान था। सभी डाक्टर, अफसर, लाॅयर, छात्र, सड़कों पर हड़ताले करते। वह कभी इनमें भागीदारी रही। उनके रौब से उनका कालेज चलता और वह पूरे जज़्बे के साथ राजनैतिक आंदोलनों में भाग लेती। ऐसे में उनका सड़को पर घूमना, नारे लगाना, हड़ताल करना बहुत ही बड़ा सहयोग था। उनके रौब से युवा वर्ग पर विशेष प्रभाव पड़ा और इसमें अहम् भूमिका रही।

प्रश्न 6: लेखिका ने बचपन में अपने भाईयों के साथ गिल्ली डंडा तथा पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।

उत्तर: आज लड़कियों की स्थितियों को लेकर काफी सामाजिक परिवर्तन आ गया है। अब पहले जैसी परिस्थितियाँ नहीं रही। अब लड़कियाँ विभिन्न प्रकार के खेल खेलती है। खेलों का माहौल भी बदल गया है। लड़के और लड़कियाँ हर प्रकार के खेल खेलती है जैसे कि फुटबाल, क्रिकेट, बाकसिंग, टेनीस आदि। आज लड़कियाँ लड़को से कंधा मिला रही है और अपने हुनर के सहारे आगे बढ़ रही है। अब लड़कियों का खुला महौल प्रदान किया जाता है ताकि वे भी अपने बलबुते से योग्य बने। अपने और अपनी पहचान स्वयं बनाए। बहुत ही कम क्षेत्रों मे आज सामाजिक सोच में भी काफ़ी परिवर्तन आया है। सानिया मिर्जा भारत की ओर से बखूबी टेनीस खेलती है और अपनी योग्यता से पूरे विश्व में उन्होने पहचान बना ली है।

प्रश्न 7: लेखिका के पिता की कोई तीन विशेषताएँ बताएँ।

उत्तर:

1. वह बच्चों को विशिष्ट बनाने की चाह रखते थे। वह उस लेखिका को रसोई से हटकर कुछ अलग बनने के लिए कहते हैं।

2. परिवार के हर सदस्य का परिस्थितियों के अनुकूल ध्यान रखते थे। जिस तरह की स्थिति होती उसी प्रकार घर की ओर ध्यान जाता।

3. वह अंतद्र्वन्दों से गुजरते थे। वह विशिष्ट बनने और मर्यादाओं का पालन करने, दोनों को महत्व देते। यह जानते हुए भी कि उनका रास्ता टकराहट है।

प्रश्न 8: लेखिका अपनी माँ के कर्तव्य परायण को उचित क्यों नहीं मानती थी?

उत्तर: लेखिका अपनी माँ के कर्तव्य परायण को अनुचित इसलिए मानती थी क्योंकि दबाव में किसी कार्य को करना सही नहीं मानती थी। उनके अनुसार उनके पिता उनकी माँ पर रौब रखते तथा वह भी अपने बच्चों की हर प्रकार की जिद को पूरा करती। उनकी माँ पतिव्रता औरत थी। लेखिका के अनुसार उनकी माँ को सोच समझकर कार्य करना चाहिए, हर जिद को पूरा करना आवश्यक नहीं होता और न ही जबर्दस्ती किसी की डाँट सुननी चाहिए। लेखिका स्वतंत्र विचारों की प्रसिद्ध लेखिका थी, सच्चाई बुराई को जानती थी और चाहती थी कि उनकी माँ किसी दबाव में काम न करें।

प्रश्न 9: लेखिका ने इस आत्मकथा को एक कहानी क्यों कहा?

उत्तर: हर व्यक्ति का जीवन एक कहानी ही होता है। कहानी में जिस प्रकार उतार-चड़ाव होते है, उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में भी उतार-चड़ाव आते है। एक संवेदनशील लेखिका होने के कारण उन्हें हर व्यक्ति का जीवन एक कहानी जैसा ही लगता है, उनका जीवन ही किसी कहानी से कम नहीं है।

पड़ोस कल्चर

पड़ोसियों का जीवन में बहुत महत्व है क्योंकि किसी प्रकार की घटना घटित होने पर रिश्तेदारों से पहले पड़ोसी हमारे साथ होते है। जिनके सहारे हम खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। पहले पड़ोस को बहुत महत्व दिया जाता था और एक प्रकार का घरेलू माहौल बन जाता था। सभी एकजुट होकर काम करने का सोचते। विपत्ति के समय एक-दूसरे का सहारा बनते और किसी को असुरक्षित महसूस न होने देते। घरी की चारदीवारी से बढ़कर बच्चों को भी खुलकर पड़ोस में घूमने दिया जाता था। लोग पड़ोस के साथ सुरक्षित, सहाय होता हुआ समझते। सभी एक-दूसरे को परिवार का हिस्सा समझते। उस जमाने में घर की दीवारें घर तक ही समाप्त नहीं होती थी बल्कि पूरे मोहल्ले तक फैली रहती। एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के काम आता और वह घर की तरह मदद करने के लिए आगे बढ़े रहते। अपने पड़ोसी की सहायता के लिए बढ़ चढ़कर भागीदार बनते और उसे कमजोर न बनने देते। इस तरह पड़ोस काफी महत्वपूण माना जाता था।

परंतु आज परिस्थितियाँ बदल गई है। समाज में काफी परिवर्तन आ गया है। जगह-जगह फ्लैट, बिल्डींग बनने के कारण पहले जैसा माहौल खो गया है। लोग अपने घरों की चार दीवारी में सीमीत रहते और आस-पास के लोगों की ज्यादा खबर न रखते। पहले जैसा अपनापन, सहायता की भावना, सुरक्षित महसूस करना और एक-दूसरे का विपत्ति में साथ देने वाली भावना लुप्त हो गई है। कोई भी किसी पर विश्वास नहीं करता इसलिए किसी से सहायता माँगने में संकोच रखता है। पड़ोस कल्चर विच्छिनन होते हुए सब असुरक्षित, असहाय और संकुचित महसूस करते हैं। लोग यह जानने में भी रूची नहीं रखते कि उनके पड़ोस में क्या हुआ है तो मदद करने की बात तो काफी दूर है। बुरे हालात में देखते हुए भी वह मदद करने के लिए आगे नहीं बढ़ते। अब पहले जैसा पड़ोस का माहौल बहुत ही कम क्षेत्रों में पाया जाता है। इस प्रकार का माहौल महानगरों की बहुत बडी कमी है।

इसी कारण लोग अपने आपको असुरक्षित महसूस करते है और चिंतित रहते है।

[/fusion_builder_column][/fusion_builder_row][/fusion_builder_container]