पाठ-4

मानवीय करूणा की दिव्य चमक

प्रश्न 1: फादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी क्यों लगती थी?

उत्तर: देवदार का वृक्ष बहुत छतनार (छाया वाला) होता है। इसकी छाया शीतल और शांति देने वाली होती है। लेखक ने विषम परिस्थिति में कादर से सांत्वना पाई और उचित मार्गदर्शन प्राप्त किया। इसकी उन्होंने फादर को देवदार की छाया जैसा महसूस किया।

प्रश्न 2: फादर बुल्के भारतीय संस्कृति के एक अभिन्न अंग है, किस आधार पर ऐसा कहा गया?

उत्तर:

1. फादर बुल्के भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग थे क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति को पूर्ण रूपेण अपनाया। जैसे वेदों का अध्ययन करना, उनसे ज्ञान प्राप्त करना और विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करना।

2. वह सभी लोगों को खुले दिल से अपनाते और उनकी सहायता करते।

3. हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए प्रयत्न करना।

4. बच्चों के प्रति विशेष स्नेह रखना और उनका मार्गदर्शन करन।

5. भारतवर्ष में अपने जीवन का अधिकांश समय बिताना, आदि कुछ ऐसी बाते हैं जो उन्हे भारतीय संस्कृति से जोड़ती है।

प्रश्न 3: पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे फादर बुल्के का हिन्दी प्रेम प्रकट होता है?

उत्तर: निम्न लिखित प्रसंगों द्वारा यह स्पष्ट होता है कि फादर का हिन्दी भाषा के प्रति विशेष प्रेम था –

1. उन्होने हिन्दी भाषा के बहुत से ग्रंथों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया क्योंकि वे ग्रंथ उन्हे प्रिय थे।

2. उन्होंने ‘परिमल’ के सदस्यों की आलोचना और समालोचना करके भरपूर सहयोग दिया।

3. वे हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाना चाहते थे।

4. हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों के द्वारा हिन्दी का उपहास करना उन्हें असहनीय था।

5. आदि ऐसी बातें है जो उन्हें हिन्दी प्रेमी ठहराती है।

प्रश्न 4: लेखक ने फादर बुल्के को ‘मानवीय करूणा की दिव्य चमक’ क्यों कहा है?

उत्तर:

1. फादर बुल्के मानवीय करूणा से सोत-प्रोत थे। जिससे एक बार मिलते उसे पूरी तरह अपना बना लेते। उनके सुख-दुख में शामिल होना अपना कर्तव्य समझते।

2. लेखक ने उन्हें यदा-कदा ही किन्ही विशेष बातों पर नाराज होते देखा अन्यथा वह नाराज नहीं होते थे।

3. सबकी समस्याओं को सुनना और उनका समाधान देना उनकी मानवीयता को दर्शाता है।

4. ईश्वर के प्रति आस्था और मानव समाज के लिए प्रेम उनके अंग-अंग में समाया था। अतः एक प्रेम की ज्योति उनके चेहरे पर विद्यामान रहती थी।

इसलिए लेखक ने उन्हें मानवीय करूणा की दिव्य चमक कहा है।

प्रश्न 5: आशय स्पष्ट कीजिए-

(क) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।

उत्तर: पाठ – मानीवय करूणा की दिव्य चमक

लेखक – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

आशय – यक नम आँखे जिन्हे गिनना नहीं जा सकता अर्थाथ काफी संख्या में लोग उनकी अंतिम समय में शामिल ने जिन्हें गिना नहीं जा सकता (अनगिनत लोग), वे सब अपने भावों के अनुकूल श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे थे।

(ख) फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।

उत्तर: पाठ – मानवीय करूणा की दिव्य चमक

लेखक – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

आशय – जिस प्रकार शांत संगीत मन और हृदय को अपने प्रभाव से शांति प्रदान करता है। उसी प्रकार फादर बुल्के को याद करना मधुर स्मृतियों से भर देता है जो सुकून और शांति देती है।

प्रश्न 6: ‘बहुत सुंदर है मेरी जन्म भूमि-रेम्सचैपल।’ – इस पंक्ति में फ़ादर बुल्के की अपनी जन्मभूमि के प्रति कौन-सी भावनाएँ अभिव्यक्त होती है? आप अपनी जन्मभूमि के बारे में क्या सोचते है?

उत्तर: हर व्यक्ति को अपनी जन्म भूमि से प्यार होता है, उससे लगाव होता है और उसकी छवी हमेशा उसके दिलो-दिमाग पर हावी रहती है। फ़ादर बुल्के को भी अपनी जन्मभूमि बहुत प्यारी थी।

हमे भी अपनी जन्मभूमि से बहुत लगाव है। हमारे अनुकूल ऐसी जन्मभूमि किसी और की नही हो सकती और यह सबसे अलग और सर्व श्रेष्ठ है। मेरी इसके प्रति अत्यंत श्रद्धा है। मुझे गर्व है एसी जन्म भूमि पर।

प्रश्न 7: आपके विचार से बुल्के ने भारत आने का मन क्यों बनाया होगा?

उत्तर: बुल्के हिन्दी प्रेमी थे। उनका हिन्दी के प्रति लगाव था। ग्रंथों को अनेक भाषाओं में अनुवाद भी किया। उसे राष्ट्र भाषा भी बनाना चहते थे। उन्होने अच्छे संयासी, अच्छे व्यक्ति की तरह अपना जीवन व्यतीत किया और हिंदी भाषा को समर्पित हो गए। इस कारण उन्होंने भारत आने का मन बनाया होगा।

प्रश्न 8: फ़ादर बुल्के ने संयासी की परंपरागत छवि से अलग एक नयी छवि प्रस्तुत की है, कैसे?

उत्तर: फ़ादर बुल्के सत्यासी होते हुए भी सन्यासी थे। फ़ादर बुल्के गुण सन्यासी के सम्पन थे। सन्यासी जैसे वस्त्र ग्रहण नहीं किए। सन्यासी मोह-माया से दूर रहता है, अपने रिश्तों से दूर रहता है परंतु फादर जिससे रिश्ता जोड़ लेते, तोड़ न पाते, सबके सुख-दुख में भागीदार रहते और यही अपना कर्तव्य मानकर चलते।

प्रश्न 9: इस पाठ के आधार पर फ़ादर कामिल बुल्के की जो छवि उभरती है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: फ़ादर बुल्के की सफेद दाढ़ी थी।

1. वह ऐसे सन्यासी थे जो सन्यासी जैसे वस्त्र ग्रहण न करते, और न ही सन्यासी जैसे अपने रिश्तो से दूर रहते।

2. हिन्दी भाषा से बहुत प्रेम करते थे।

3. अपनी माँ की ममता को भी न भूला पाए।

4. अपनी मातृ भूमि के प्रति उनका अत्यंत लगाव, प्रेम और श्रद्धा का भाव था।

5. वह सभी के दुख-सुख में शामिल होना अपना कर्तव्य मानते।

6. उनका हिंदी भाषा से बहुत प्रेम था।

7. अपना बाकी का समय वह भारत में गुजारना चाहते थे। इस तरह का व्यक्तित्व उनकी गरीमा थी।

8. मानवीय करणा से ओत प्रोत थे।

प्रश्न 10: लेखक ने फादर बुल्के को ‘दिव्य चमक’ क्यों कहा?

उत्तर: लेखक ने फादर बुल्के को ‘दिव्य चमक’ इसलिए कहा है क्योंकि उनकें क्रोध नहीं थे, आवेरा (क्रोध और ग्लानी का मिलाप) था। उनके चेहरें पर चमक रहती थी जो कि दिव्य थी, ज्ञान और परमात से भरी थी, ग्लानी और अलौकिक थी। उनमें सबसे मिलकर रहने की सोच थी, सबका अपना बना लेने का भाव था और किसी तरह का अहम नहीं।

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