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Class 10 – क्षितिज : पाठ-2 : बालगोबिन भगत

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Class 10 – क्षितिज : पाठ-2 : बालगोबिन भगत

पाठ-2

बालगोबिन भगत

प्रश्न 1: खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?

उत्तर: खेतीबारी से जुडे़ गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी निम्न चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे-

1. वह किसी का सहारा नहीं लेते थे और स्वयं ही अपना सारा कार्य करते थे। अपने बेटे की मृत्योपरांत भी उन्होने अपनी पतोहु को अपने घर जाने के लिए कहा क्योंकि वह किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते थे।

2. वह कबीर के बहुत बड़े भक्त थे और उनके पदों को गाकर लीन हो जाते थे। वह अपने गान में इतने लीन हो जाते थे कि सब ही उनकी लय में गाने लगते।

3. वह कर्मों और सिद्धान्तों में विश्वास रखते थे।

4. वह निस्वार्थ भाव से समाज का कल्याण करने मे विश्वास करते थे।

5. कभी झूठ नहीं बोलते थे और खरा व्यवहार रखते थे।

6. वह सन्यासी होते हुए भी गृहस्थ थे और गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी थे।

7. किसी से दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते और न ही किसी से झगड़ा करते।

प्रश्न 2: भगत की पुत्रवधू उन्हे अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?

उत्तर: भगत की पुत्रवधू उन्हें अपने पति के मृत्योपरांत अकेला इसलिए नहीं छोडना चाहती थी क्योंकि उसके बाद उनकी सेवा (देखभाल) करने वाला कोई भी नहीं था। बुढ़ापे में यदि वह शरीर से कमजोर हो जाते या तबियत खराब हाने पर, कोई भी उनकी सेवा करने वाला नहीं था। वह ही पूरे परिवार में एक मात्र सहारा रह गई थी। इसलिए वह उनके साथ ही रहकर उनकी सेवा और देखभाल करना चाहती थी।

प्रश्न 3: भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किसी तरह व्यक्त की?

उत्तर: भगत ने बेटे के शव को आँगन में एक चटाई पर लिटाकर, एक सफेद कपड़े से ढ़क दिया। वह कुछ फूल तो हमेशा ही रोंपते रहते थे, उन फूलों में से कुछ तोड़कर उस पर बिखरा दिए; फूल और तुलसीदल भी। सिरहाने में एक चिराग जला रखा था। उसके सामने जमीन पर ही आसन जमाए गीत गाए चले जा रहे थे। वही स्वर और पुरानी तल्लीतनता के साथ।

वह गाते जा रहे थे और रोती हुई पतोहू को रोने के बजाए उत्सव मनानम के लिए कह रहे थे। उनके अनुसार आत्मा परमात्मा का अंश है और मृत्योपरांत इनका मिलाप होता है इसलिए हमें इस पर शोक या दुख व्यक्त नहीं करना चाहिए। वह सबको उत्सव बनाने के लिए कह रहे थे। इस तरह उन्होने मृत्यु को एक दुख का विषय न बताते हुए उसे उत्सव का समय बताया है और सामाजिक सोच में परिवर्तन लाने का प्रयत्न किया है।

प्रश्न 4: भगत की वेषभूशा को अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: भगत मँझोल (मध्यम) कद के गोरे गिट्ठे आदमी थे। उनकी साठ वर्ष के ऊपर उम्र थी। बाल सफेद थे (पक गए थे)। वह लंबी दाढ़ी या जराजूट तो नहीं रखते थे, किन्तु उनका चेहरा सफेद बालों से ही जगमग किया करता था। वह कपड़े बिल्कुल कम पहनते। कमर में एक लंगोटी-मात्र और सिर में कबीरपंथियो की-सी कनफरी टोपी। जाड़ा आने पर वह काली कमल ऊपर से ओढ़े रहते। मस्तक पर हमेशा रामानंदी चंदन होता जो नाक के कए टोर से शुरू होता और गले में तुलसी की जड़ो की एक बेडौल माला पहने रहते।

प्रश्न 5: बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?

उत्तर: भगत की दिनचर्या लोगों में अचरज का कारण इसलिए थी क्योंकि उनके आचरण में कोई परिवर्तन नहीं आया था। वह सवेरे उठ गंगा स्नान करने जाते और बाद में खेती बारी करने में जुट जाते। अपने गान से वह सबके मन को मोह लेते और सब एक लय में काम करते। वह अपने गपरे में इतने मगन हो जाते कि सभी उसमें लीन हो जाते।

प्रश्न 6: पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताँए लिखिए।

उत्तर:

1. बालगोबिन भगत कबीर पंथी गृहस्थ सन्यासी थे।

2. वह कबीर जी को अपना गुरू मानते उनके आदर्शों पर ही चलते और उन्ही के पदों को गाते थे। वह अच्छे/उत्तम स्वर और तल्लीनता में गाते।

3. उनके गायन में वह आकर्षण था जिससे लोग खुदबखुद चले आते और उसमें लीन हो जाते।

4. वह गाते समय इतने मस्त और मग्न हो जाते थे कि शीतऋतु में भी उनके ललाट (मस्तक/माथे) पर श्रमबिंदु (पसीना) झलक आता था।

5. उनका गायन लोगों में उत्साह और उमंग भर दूता था।

वह गाते समय इतना लीन हो जाते कि लोग भी एक लय में मग्न होकर गाने लगते।

प्रश्न 7: कुछ मार्मिक प्रसंगो के आधार पर यह दिखाई देता है कि बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्याताओं को नहीं मानते थे। पाठ के आधार पर उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: बालगोबिन भगत सामाजिक रूडि़यो को नहीं मानते थे। जैसे कि उन्होंने अपने पुत्र के शव की अन्तिम क्रिया पतोहु से करवाई जबकि यह समाज में नहीं माना जाता परंतु जो उन्हें सही लगता था। वह वही करते। समाज की रूढि़यो को नहीं मानते और सही कार्य करते।

जैसे कि समाज में विधवा विवाह नहीं किया जाता। परंतु बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र के मृत्योपरांत अपनी पतोहु को उसके भाई के साथ इसी शर्त पर भेजा कि वह उसका दूसरा विवाह करवाए।

इससे पता चलता है कि बालगोबिन भगत सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे और सही मार्ग पर चलने की कोशिश करते थे। न तो किसी से डरते, न ही कभी किसी के दबाव में आकर अपना फैसला बदलते और अपनी ही दृष्टिकोण से सही कार्य करने की कोशिश करते।

प्रश्न 8: धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर लहरियाँ किस तरह चमत्कृत कर देती थी? उस माहौल का शब्द चित्र प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर लहरियाँ पूर्ण रूप से चमत्कृत कर देती हैं। ठंडी पुरवाई चल रही थी और आसमान बादलों से घिरा हुआ था। ऐसे समय कीचड़ में लिथड़े बागोबिन भगत रोपाई करते समय अपने मधुर स्वर तरंग से सबको अचंभित कर देते। उनका कंठ एक-कए शब्द को संगीत के जीने पर चढ़ाकर कुछ को इस पृथ्वी की मिट्टी पर खड़े लोगों के कानों की ओर। खेलते हुए बच्चे झूम उठते, मेड़ पर खड़ी औरतों के होंठ काप उठते (संगीत को गाने लगती), गुनगुनाने लगती; हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते; रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगती। बालगोबिन भगत के मधुर संगीत (मनमोहक) में जादू था जिससे की लोग मग्न हो जाते और एक ही लह और उत्साह के साथ अपने कार्य करने लगते।

प्रश्न 9: पाठ के आधार पर बताइए कि बालगोबिन भगत की कबीर पर श्रद्धा किन-किन रूपों में प्रकट हुई है?

उत्तर: बालगोबिन भगत की कबीर पर श्रद्धा निम्न रूपों में प्रकट हुई-

1. वह भी कबीर की तरह निर्गुण ब्रह्म को मानते थे।

2. वह भी संग्रह में विश्वास नहीं करते थे।

3. वह कबीर की तरह ही सामाजिक रूडि़यों को मिटाने के प्रयत्न करते थे। (उन्हे ही अपना गुरू मानते थे)

4. स्त्री शिक्षा और उनके हालात सुधारने के लिए कबीर की तरह से प्रयास करते थे।

5. कबीर की तरह ही कर्मो में विश्वास करते थे।

6. कबीर के आदर्शों को मानते थे और उनके ही पदों को मधुर और मनमोहक रूप में गाते थे, जो कि सबको एक लय में जोड़ देता था।

7. जो भी खेत की फसल होती उसे कबीर के दरबार में भेंट करते थे और प्रसाद के रूप में जो भी मिलता उसी से अपना गुजारा चलाते।

वह उन्हें अपना गुरू मानते थे और उनके सिखाए आदर्शों को गृहण करते थे।

प्रश्न 10: आपकी दृष्टि में भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के क्या कारण हो सकते है?

उत्तर: बालगोबिन भगत की प्रवृत्ति कबीर के समान ही थी। दोनों के ही समान विचार थे। वे दोनो ही निर्गुण ब्रह्म को मानते थे, स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देते थे और समाजिक रूडि़यो को समाज से हटाने के प्रयत्न करते थे। समाजिक मान्यताओं को नही मानते थे। वे दोनो ही कर्म में विश्वास करते थे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दोनो के विचार काफी समान थे इसलिए भगत की कबीर के लिए अगाध श्रद्धा थी।

प्रश्न 11: गाँव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश अषाढ़ चढ़ते ही उल्लास से क्यों भर जाता है?

उत्तर: भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ पर अधिकतर लोगों की जीविका खेती पर निर्भर करती है। बरसात के महीनों में (अषाढ़) जमीन पानी पी कर तृप्त हो जाती है और पुनः उर्वरक शक्ति को ग्रहण करके फसल के लिए तैयार हो जाती है। इसलिए गावों में हर्ष और उल्लास का बीज बोने और पौधे लगाने का कार्य प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 12: मोह और प्रेम में अंतर होता है। भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन का सच सिद्ध करोगे?

उत्तर: यदि कोई स्वार्थवश प्रेम करता है तो वह मोह है। प्रेम निस्वार्थ होता है। बालगोबिन भगत अपने पुत्र से प्रेम करते थे, मोह नहीं। उन्होंने अपने पुत्र से प्रेम इसलिए नहीं किया ताकि वह उनका आगें जाकर उनका सहारा बनेगा बल्कि वह सुस्त था। और बोंदु था इसलिए वह उससे ज्यादा प्रेम करते थे। उनके अनुकूल ऐसे लोगों को ज्यादा प्रेम करना चाहिए।

वह अपनी पुत्रवधू से भी निस्वार्थ भाव से प्रेम करते थे। अपने पुत्र के मृत्योपरांत उन्होने उससे सहारा नहीं माँगा बल्कि उसके जीवन की खुशी के लिए उसका दूसरा विवाह करवाने की शर्त उसके भाई के सामने रखी। वह अपनी देखभाल और सेवा करवाने की नहीं सोचते थे और निस्वार्थ प्रेम करते थे।

प्रश्न 13: आपके विचार में क्या बालगोबिन भगत सच्चे सन्यासी थे?

उत्तर: नहीं, बालगोबिन भगत सही माइने में सच्चे सन्यासी नहीं कहे जा सकते क्योंकिं –

1. वह सन्यासी की तरह अपने रिश्तो को नहीं तोड़ सकते थे। जिससे एक बार रिश्ता जोड़ते उसे हमेशा निभाते।

2. वह सन्यासियों की वेषभूशा नहीं पहनते थें।

3. सन्यासी की तरह वह हमेशा के लिए ईश्वर में लीन न थे। बल्कि वह दूसरों के दुख बाँटकर उन्हें सही मार्ग दर्शन देते।

इस प्रकार हम कह सकते है कि वह पूरी तरह सन्यासी न थे।

प्रश्न 14: आप बालगोबिन भगत को कबीर पंथी कैसे कह सकते हैं?

उत्तर: बालगोबिन भगत को कबीर पंथी इसलिए कहा जाता था क्योंकि उनकी कबीर के प्रति अटूट श्रद्धा थी। उनकी श्रद्धा निम्न रूपों में प्रदर्शित होती है –

1. वह संग्रह में विश्वास नहीं रखते थे।

2. समाजिक सेवा को अपना उत्तरदायित्व मानते थे।

3. कर्म में विश्वास रखते थे।

4. सामाजिक रूडियों को मिटाने के लिए पुरजोर प्रयत्न करते थे।

प्रश्न 15: बालगोबिन भगत ने अपने बेटे की अंतिम क्रिया कैसे की? समाज की नीति से वह कैसे भिन्न थी?

उत्तर: भगत ने बेटे के शव को आँगन में एक चटाई पर लिटाकर, एक सफेद कपड़े से ढ़क दिया। वह कुछ फूल तो हमेशा ही रोंपते रहते थे, उन फूलों में से कुछ तोड़कर उस पर बिखरा दिए; फूल और तुलसीदल भी। सिरहाने में एक चिराग जला रखा था। उसके सामने जमीन पर ही आसन जमाए गीत गाए चले जा रहे थे। वही स्वर और पुरानी तल्लीतनता के साथ।

वह गाते जा रहे थे और रोती हुई पतोहू को रोने के बजाए उत्सव मनानम के लिए कह रहे थे। उनके अनुसार आत्मा परमात्मा का अंश है और मृत्योपरांत इनका मिलाप होता है इसलिए हमें इस पर शोक या दुख व्यक्त नहीं करना चाहिए। वह सबको उत्सव बनाने के लिए कह रहे थे। इस तरह उन्होने मृत्यु को एक दुख का विषय न बताते हुए उसे उत्सव का समय बताया है और सामाजिक सोच में परिवर्तन लाने का प्रयत्न किया है।

इस प्रकार से अंतिम क्रिया करे उन्होंने समाजिक नीतियों का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने मृत्यु को एक दुख का विषय न बताते हुए, एक उत्सव का समय बताया है। लाग अपनो सक भिछड़ने का दुख/शोक प्रकट करते हैं परंतु वह इस बात से बेखबर है कि मृत्योपरांत ही आत्मा परमात्मा से मिलती है। तो इस प्रकार यह भिन्न है। इस तरह उन्होंने समाजिक सोच में परिवर्तन लाने के लिए प्रयत्न किया।

प्रश्न 16: क्या आप बालगोबिन भगत के क्रिया कला को आदर्श मानते है/उचित मानते हैं?

उत्तर: यदि मनुष्य जन्म लेता है, तो उसकी मृत्यु आना भी आवश्य है। मृत्यु को टाला नहीं जा सकता। मृत्योपरांत हम अपने प्रिय से तो जरूर दूर होते हैं परंतु उसकी आत्मा ईश्वर से मिलती है। आत्मा परमात्मा का अंश है, और मृत्यु के उपरांत ही इनका मिलाप होता है। इसलिए मृत्यु पर शोक न बनाते हुए, इसे एक सत्य के रूप में लेकर सामना करना चाहिए। जिस प्रकार बालगोबिन भगत ने अपने बेटे की क्रिया की, उससे समाज की सोच में परिवर्तन लाने का प्रयत्न भी हुआ। मृत्यु आना आवश्य है क्योंकि उनका नजरीया समाज की सोच को बदलने में मदद करता है।

बालगोबिन भगत के चरित्र की विशेषताएँ –

1. वह जो सन्यासी होते हुए भी गृहस्थ था और गृहस्त होते हुए भी सन्यासी था।

2. एक बिना पढ़ा लिखा उच्च विचारों वाले व्यक्ति थे। व्यक्ति बिना पढ़े भी अपनी सोच और कर्मों से अच्छा बन सकता है।

3. वह समाजिक रूडि़यों को मिटाने के प्रयत्न करते थे। अपने पुत्र की मृत्यु पर अपनी पुत्रवधू से ही मुखाग्नि करवाई। और उसके भाई से उसका दूसरा विवाह करवाने के लिए कहा।

4. विधवा विवाह को बढ़ावा दिया। उन्होने अपनी पतोहु को उसके भाई के साथ इस शर्त पर भेजा की वह उसका दूसरा विवाह करवाए।

5. कबीर पंथी थे। वह कबीर की तरह कर्म में विश्वास करते थे।

6. अच्छे गायक थ

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By | 2016-11-21T04:38:03+00:00 July 11th, 2012|Question and Answer|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

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