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Class 10 – काव्य : छाया मत छूना -गिरिजाकुमार माथुर

///Class 10 – काव्य : छाया मत छूना -गिरिजाकुमार माथुर

Class 10 – काव्य : छाया मत छूना -गिरिजाकुमार माथुर

छाया मत छूना

-गिरिजाकुमार माथुर

निराश होने पर मनुष्य सुखद समय को भी महसूस नहीं कर पाता और समय निकल जाने पर कोई लाभ नहीं होता। अतः कवि ने आह्वान किया है कि मनुष्य को अतीत से चिपकना नहीं चाहिए। वर्तमान में परिस्थितियों का सामना करना चाहिए और भविष्य की तरफ ध्यान देना चाहिए। तभी जीवन सार्थक हो सकता है।

1. इन पंक्तियों में कवि कहना चाहते है कि मन को कभी निराश नहीं होने देना चाहिए, अन्यथा हमें दुख का सामना करना पड़ेगा। मन यदि निराश हो तो कोई कार्य पूर्णता के साथ, सम्पन्नता के साथ नहीं हो पाता। निराश हारे से परेशानियाँ और बढ़ जाती है। कवि का मानना है कि अतीत को याद करके निराश होने और उदास होने से कुछ नहीं होगा बल्कि दुख दुना होगा और हर कार्य कठीन प्रतीत होगा। जब हम कुछ याद करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानों यादों की सुरंग में घुसते चले जा रहे हो, जिसमें बहुत सी सुहावनी और अच्छी स्मृतियाँ होती है। पुरानी बाते एक चित्र सा खिंचती चली जाती है और बीती बातों की स्मृतियों में डूबते चले जाते है। यह यादे न केवल आँखों को आकर्षित करती है परंतु सब कुछ इसके वशीदुत हो जाता है। भावों की खुशबू खींच ले जाती है जो कि मन को बहुत भाती है। सुख के क्षण गुजर जाते है और स्मृतियाँ शेष रह जाती है। अर्थात समय निकल जाता है और यादें रह जाती है। रात तो बीत जाती है पर उस रात की यादे दिमाग पर रह जाती है। हमें अतीत की यादों की सुरंग में नहीं घुसना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दुख के अलावा कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। कानों में फूल पहले थे वे चाँदनी के आकर्षण में बान्ध लेते है और ध्यान केंद्रित कर लेते है। छोटा सा स्पर्श (सुख) हमारे लिए जीने का सहारा बन जाता है। जीवन को सुख से भर देता है और जीवन का मार्ग दर्शन करता है।

2. इन पंक्तियों में कवि गिरिजाकुमार माथुर जी ने मनुष्य को निराश न होने की प्रेरणा दी है और कहा है कि संसार में यश (प्रसिद्धि), मान-सम्मान और धन-सम्पत्ति के पिदे नहीं दौड़ना चाहिए क्योंकि ये सब यथार्थ नहीं भ्रम है। ये मनुष्य को मृग-तृष्णा की तरह हमेशा दौड़ाते रहते है लेकिन प्राप्त नहीं होते। कवि का मानना है कि हर चमकती चीज के पीछे अंधकार होता है। अतः मनुष्य को भ्रम के पीछे न दौड़कर यथार्थ का पूजन करना चाहिए, उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि वह ही सत्य है, वही वास्तविक है।

3. कवि गिरिजा कुमार माथुर ने इन पंक्यिों में विचार और कर्म की दुविधा का चित्रण किया है कि मनुष्य दुविधा के कारण सही रास्ते का अनुसरण नहीं कर पाता जिसके कारण उसे शारीरिक सुख तो मिल जाता है लेकिन मन अंतद्वन्दों (तनाव से) से घिरा रहता है। और वही उन अवसरों और सुखों का आनन्द नहीं ले पाता जो उसे प्राप्त होते है और समय निकल जाने पर उनके लिए पछताते है। कवि का मानना है कि यदि हमने भविष्य उज्जवल बनाना है तो जो कुछ हमें नही मिला उसे भूलना ही हितकर (लाभदायक, श्रेयकर) है। निराशा को जीवन में प्रवेश मत करने दीजिए तभी भविष्य उज्जवल होगा, अन्यथा कठिनाईयाँ, दर्द, वेदना और भी अधिक हो जाएगी।

प्रश्न 1.: कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?

उत्तर: कवि गिरिजाकुमार माथुर ने यथार्थ (सच्चाई) के पूजन (सामना, अपनाना) की बात इसलिए कही है क्योंकि यथार्थ कटु (कड़वा) पर सत्य होता है, वही जीवन का आधार होता है, वही भविष्य का निर्माण करता है। अतः उसका सामना करना ही उचित होगा।

प्रश्न 2.: भाव स्पष्ट कीचिए –

प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा हे, हर चंद्रिका में छिमी एक रात कृष्णा है।

उत्तर: कवि – गिरिजाकुमार माथुर

कविता – छाया मत छूना

भाव – इन पंक्तियों द्वारा कवि गिरिजाकुमार माथुर जी यह कहना चाहते है कि मनुष्य जीवन भर मान सम्मान, प्रसिद्धि और धन सम्पत्ति के पीछे भागता है। इन्हे प्राप्त करने के लिए नहीं भगना चाहिए क्योंकि ये यथार्थ नहीं भ्रम है। जिस प्रकार मृग पानी को प्राप्त कर लेने के भ्रम में (तृष्णा) में जीवन व्यतीत करता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने मान-सम्मान को प्राप्त करने के लिए मृगतृष्णा के समान हमेशा दौड़ते रहते है लेकिन प्राप्त नहीं होते। कवि का मानना है कि हर चमकती चीज के पीछे अंधकार होता है। अतः मनुष्य को श्रम के पीछे न दौड़कर यथार्थ का पूजन करना चाहिए, उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि वह ही सत्य है।

प्रश्न 3.: ‘छाया’ शब्द यहाँ किस संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है? कवि ने उसे छूने के लिए मना क्यों किया है?

उत्तर: ‘छाया’ शब्द यहाँ निराश के लिए प्रयुक्त हुआ है। अतीत को याद कर निराशा में दुख दुना हो जाता है। निराश रहते हुए मनुष्य कर्म के प्रति पूर्णनिश्ण नहीं रख पाता। कोई भी कार्य पूर्णता/सम्पन्नता के साथ नहीं कर पाता। अतः कार्य ठीक प्रकार से नहीं होता और व्यक्ति की महनत, समय और धन का अपव्यय हो जाता है। इस लिए कवि ने उसे छूने से मना किया है।

प्रश्न 4.: ‘मृगतृष्णा’ किसे कहते है, कविता में इसका प्रयोग किस अर्थ में हुआ है?

उत्तर: ‘मृगतृष्णा’ मृग के भ्रम को कहते है। मृग अपनी प्यास में पानी मिलने के भ्रम में जीवन व्यतीत करता है। पानी (भ्रम) को पाने के लिए उसके पीछे भगता है। मनुष्य भी मृगतृष्णा के समान अपना जीवन में मान-सम्मान, माया, दौलत, यश की चाहत में उसे पाने के लिए उसके पीछे दौड़ता रहता है। भ्रम में इन्हें पाने की चाहत रखता है। परंतु इनके पीछे नहीं भागना चाहिए क्योंकि ये यथार्थ नहीं भ्रम है और यथार्थ सत्य का पूजन करना चाहिए, उसे अपनाना चाहिए।

प्रश्न 5.: कविता में व्यक्त दुख के कारणों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कविता में व्यक्त निम्न दुख के कारण बताए हैं –

1. अतीत से जुड़े रहना – जब हम अपने अतीत से जुड़े रहते है तो उसकी अच्छी, बुरी यादों में खोकर दुखी हो जाते है और उस निराशा में अपना वर्तमान सही से नहीं जी पाता और बाद में पछताते है।

2. सफलता न प्राप्त करने पर निराश हो जाना – जब मनुष्य को सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है जो कि गलत है। हमें उज्जवल भविष्य के लिए और महनत करनी चाहिए और अपना असफलता को भूला देना चाहिए तभी हम कार्य में सम्पूर्णता ला पाएँगे।

3. दुविधा में रहना – जब हम गलत रास्ते का चुनाव करते है, तो दुखी हो जाते है। अंतद्र्वन्दों से गुजरते है और सुखद समय दुखी होकर निकालते है। जब सुख चला जाता है तो पछताते है। गलत फैसलों को भूलाकर भविष्य के लिए सही मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, तभी भविष्य उज्जवल होगा।

प्रश्न 6.: ‘बीती ताहि बिसार दे आग की सुधि ले’ यह भाव कविता की किस पंक्ति में झलकता है।

उत्तर: यह भाव कविता की इस पंक्ति में झलकता है – ‘जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण’। इन पंक्तियों का अर्थ है कि जीवन में जो नहीं मिला उसके लिए निराश न होकर हमें भविष्य के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि न मिलने के बारे में सोचने से बस और कुछ नहीं दुख दुगना हो जाता है।

प्रश्न 7.: कविता में विशेषण के प्रयोग से शब्दों के अर्थ में विशेष प्रभाव पड़ता है, जैसे कठिन यथार्थ।

कविता में आए ऐसे अन्य उदाहरण छाँटकर लिखिए कि इससे शब्दों के अर्थ में क्या विशिष्टता पैदा हुई।

उत्तर: कविता में आए विशेषण –

1. सुरंग – सुधियाँ सुहावनी

2. छवियों की चित्रगध

3. दुवधिा – हित – साहस

4. शरद – रात

5. रस – बसंत

6. प्रभुता का शरण-बिंब

विशेषणो के आने से अर्थ में विशेष विशिष्टता पैदा होती है। काव्य सौंदर्य बढ़ता है और उसकी शोभा बढ़ जाती है। उसमें एक चमत्कार पैदा होता है। विशेषण शब्द की महिमा को प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयुक्त होते है।

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By | 2016-11-21T04:38:03+00:00 July 11th, 2012|Question and Answer|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

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