” हमको लिखो है कहा  !”

पत्र ,पाती ,खत ,चिठ्ठी ,चिठिया जितने नाम उससे भी कहीं अधिक भावों को अभिव्यक्त करते हैं ,ये शब्द | डाकिया  {पोष्ट मैन }को देखते ही आशा का भाव जाग्रत

होता है ,दिल की धड़कने बढ़ जाती है | क्षण भर में कई भावों का समावेश हो जाता है |एक अजीव सी गुदगुदी तन -मन में भर जाती है |

पत्र वह साधन है ,जो भावों को साकार अभिव्यक्ति देते हैं | बार -बार पढ़ कर उनका लुत्फ़ उठाया जा सकता है | जितनी बार भी पढ़िए ,उतने

ही प्यारे लगते हैं | भावों के सम्प्रेषण का यह ऐसा माध्यम है जिसे तहे दिल से महसूस किया जा सकता है |मिथिला से श्री राम -लक्ष्मण का सन्देश पाने पर राजा

दशरथ के मनोभावों को महसूस कीजिए कि वे उनके बिछड़ने का गम और समाचार पाने का हर्ष ,भावविभोर होने के कारण व्यक्त करने में असमर्थ हो जाते हैं |

“राम लषण उर करबर चीठी  ,

रह गए कहत न खाटी -मीठी  |”

जब यही पत्र उनकी माताओ को दिखाया गया तो इस पत्र में उन्होंने बेटों की छवि  को देखा और वही सुख पाया जो उन्हें गले

लगा कर मिलता |

“लहहि परस्पर अति प्रिय पाती ,

ह्रदय लगाय , जुडावहि  छाती ||

किसी का भी पत्र हो, कान अपना नाम सुनने को बेचैन होते हैं तो आँखे उसे देखने को |  उद्धव जब श्री कृष्ण का पत्र  गोपिकाओं को दिखाते हैं तो प्रेम के आधिक्य

से वे सभी अपने -अपने संदेश  को पढ़ना चाहती हैं और उद्धव के हाथ की पाती टुकडों में बट जाती है | प्रेम मगन गोपिकाएँ अपने प्रिय के सन्देश को सुनने -देखने

का इंतजार नहीं कर पातीं और ..हमको लिखो है कहा ………हमको लिखो है कहा ………जानने की उत्कंठा उस पाती को प्राप्त करने की ओर प्रेरित करती है | उद्धव उस

प्रेम के समक्ष मूक हो जाते हैं और ज्ञान पर प्रेम हावी हो जाता है |

संदेशा हो या प्रेम की अभिव्यक्ति हो ,सांत्वना के शब्द हों या प्यार का इजहार हों ,क्रोध हो या गलती का एहसास हो ,किसी बात का इकरार हो इनकार

अभ्यर्थना हो या शिकायत हो आवेदन हो या सिर्फ सम्प्रेषण हो सबके लिए सुलभ साधन है ये पत्र |………….जहाँ रु ब रु होने की हिम्मत न हो ,कह डालिए अपनी बात

इसके जरिए | अप्रत्यक्ष होने पर भी यह छोटा सा कागज रु ब रु कर देता है ,चाहें दोष्ट हो दुश्मन | मजे की बात यह है कि यह प्राप्त करने वाले को उसी भाव से

भर देता है जिस भाव से उन्हें लिखा गया था |

बिना पढ़ी -लिखी प्रेमिका सिर्फ अपना प्रणाम लिखवा कर ही सारे संदेस भेज देती है |

“खत लिखदे संवरिया के नाम बाबू ,

कोरे कागज पे लिख दे सलाम बाबू ”

आदिकाल से इनका प्रयोग विभिन्न रूपों में होता रहा है | कभी ये भोज पत्र पर लिखे गए तो कभी रेशमी कपडों पर तो कभी विभिन्न

प्रकार के कागजों पर |एक लंबा सफर तै करते हुए ये ई .मेल तक पहुँच गए हैं ,लेकिन इनके महत्व में ,चाहत में कोई अंतर नही आया | हाँ जो अपनापन ,स्नेह

लगाव हस्त लिखित पत्रों में होता है वह कम्प्युटर से निकले प्रिंट में नहीं |

पत्र हमारी भावनाओं का ही नहीं ,परम्पराओं और शिष्टाचार का भी संवहन करते हैं |आज भी हम पत्र आने का इंतजार करते हैं |सच बताएये

क्या पत्र देख कर आपके मन में यह नहीं आता ………”हमको …लिखो है कहा …………….”