[ultimatemember form_id=12643]

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बच्चे उद्दंड हो रहे हैं |-पक्ष और विपक्ष

//सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बच्चे उद्दंड हो रहे हैं |-पक्ष और विपक्ष

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बच्चे उद्दंड हो रहे हैं |-पक्ष और विपक्ष

पक्ष

वह बच्चा कक्षा में सिगरेट क्यों पी रहा है?
अरे कक्षा में इतना शोर क्यों हो रहा है ?
अध्यापक


परेशान क्यों है?
विद्यालय में पुलिस क्यों आई है?
मैं बताती हूँ ….. ये इक्कीसवीं सदी के विद्यार्थी हैं इन्हे सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों के दंड से बचाकर स्वतंत्र और शक्तिशाली बनाया है

महोदय इस कंप्यूटर युग में विद्यार्थी की सोच भी कंप्यूटर की तरह हो गयी है हर कार्य वे अपनी आयु से एक कदम आगे बढ़ कर करना चाहते हैं वे समझते हैं कि वे अपना अच्छा -बुरा समझने लगे हैं अत:उन्हें कुछ समझाया न जाए वे २१वी सदी के विद्यार्थी हैं १९वी सदी के अध्यापकों का अधिकार न थोपा जाए इसे वे एक पीडी का अंतर मानते हैंअध्यापकों का अपमान करना आज आम घटना हो गयी है जिसका प्रभाव परिवारों पर भी दिखाई देता है कोई अपने माता -पिता को घर से निकलता है तो कोई उनके साथ अभद्र व्यवहार करता है जब पौधे ही अच्छे न होंगे तों फसल अच्छी कैसे होगी आज जब अध्यापक के सर पर नौकरी बचाने की तलवार टांग दी गयी है तों बच्चे उद्दंड क्यों न होंगे बच्चे तों बन्दर की तरह होते हैं उन्हें अनुशासित करने के लिए लकडी नहीं होगी तों अनुशासन कैसे होगा ?

महोदय, सदियों से रीति चली आ रही है कि एक बद मस्त हाथी को महावत ही अपने अंकुश द्वारा नियन्त्रित करता है महावत जितना तजुर्वेकार होगा हाथी को उतना ही नियन्त्रित कर लेगा ताकि वह किसी की हानि न कर सके इसी तरह विद्यार्थियों को भी अनुशासित करने के लिए दंड एवं भय की आवश्यकता है प्रचीन काल से चली गुरु शिष्य परम्परा धीरे -धीरे लुप्त होती जा रही सुप्रीम कोर्ट ने इसे विनाश के कगार तक पहुंचा दिया है जिस तरह रोगी शरीर के लिए कडवी दवाई के साथ -साथ शल्य चिकित्सा की भी आवश्यकता होती है उसी प्रकार उद्दंड बच्चों को सुधारनेके लिए दंड की आवश्यकता होती है जहाँ समझाने से बात न बने वहां भय से काम कार्य जाता है शिक्षक का कर्तव्य बच्चे का चहुँमुखी विकास करना होता है उसके लिए उसे कुछ भी क्यों न करना पड़े

महोदय बढ़ई जब लकडी से कोई सामान बनता है तबउस पर तीखे -नुकीले औजारों से वार करता है उसके इन्हीं वारों से एक साधारण लकडी सुंदर रूप लेकर बाजारों मेंऊँचे दामो पर बिकती है उसी तरह विद्यार्थी एक लक्कड़ है और शिक्षक अपने विद्यार्थी को सुधारने के लिए हर तरह से कार्य करता है ताकि वह एक अच्छा नागरिक बने

उदंडता से किसी का भला नहीं हुआ है प्राचीन काल के कंस रावण शिशुपाल के अंत से कौन परिचित नहीं है ? हिटलर मुसोलिनी, सद्दाम हुसैन का अंत भी सुखद न था के विद्यार्थी का भविष्य क्या होगा ;यह चिंतनीय है सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बच्चों की उदंडता को वह बढावा दिया है कि उसे रोकना असम्भव प्रतीत होने लगा है इस फैसले हो पुन::विचार करने की आवश्यकता है अन्यथा भविष्य क्या होगा यह प्रश्न भयावह है अंत में में यही कहना चाहती हूँ

“हम कौन थे क्या होगये और क्या होंगे अभी

आओं विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी
विपक्ष
रोको न नदियों को बाँध से ,
कलकल कर के बहने दो ,
खुले गगन में बच्चों को ,
खुले पंखों से उड़ने दो ,
बच्चे तो हैं फूलों की क्यारी ,
इन फूलों को मस्त हवा में उड़ने दो
 
निर्णायक गण मैं इस बात से सहमत नही हूँ कि बच्चे उदंड हो रहे हैं भारत वह देश है जहाँ नेहरू जैसे महान पुरूष हुए जो बच्चों से बेहद प्यार करते थे इसलिए इस देश के कानून का बच्चों के पक्ष में निर्णय करना उचित है
महोदय बदलते समय के साथ साथ सब कुछ बदल रहा है आज अध्यापक और बच्चों का सम्बन्ध गुरु -शिष्य का नही अपितु मित्रता का भी माना जाता है हर सम्बन्ध की कुछ सीमाएं होती हैं परन्तु आज कुछ शिक्षक इन सीमाओं को पार करके विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार करने लगे हैं जिससे इन विद्यार्थियों के भविष्य पर ही नही अपितु उनके शारीरिक और मानसिक पटल पर भी प्रभाव पड़ता है
आए दिन हम शिक्षकों के रुद्र रूप के उदाहरन देख रहे हैं कभी शिक्षक किसी की बाजु तोड़ देते हैं तो कही विद्यार्थी को अपमानित करके आत्म हत्या तक के लिए मजबूर कर देते हैं कुछ दिनों पहले ही एक शिक्षक की सजा का घिनौना रूप देखने को मिला जब मात्र छ: वर्ष की बच्ची को ग्रह-कार्य न करने पर उसे निर्वस्त्र करके अपमानित किया गया परिणाम स्वरूप वह
इतना डर गयी कि वह विद्यालय के नाम से ही घबराने लगी क्या यह उचित है?
महोदय शिक्षक वह दर्पण है जो विद्यार्थी को सही -गलत की पहचान कराता है ,उसके व्यकितत्व को संवारता है ,भविष्य का उत्तराधिकारी बनाता है परन्तु यदि वह दर्पण स्वयं ही बिगडा और धुंधला होगा तो दुसरे का व्यक्तित्व क्या निखरेगा ?
कुम्हार कितने प्यार से मिट्टी गूँथ कर फ़िर उसे चाक पर चदाता है और अपने कोमल स्पर्श से वर्तनों को आकार देता है ठीक वैसे ही अध्यापक भी प्यार से विद्यार्थी को संवारता है न कि कठोरता से | सुप्रीम कोर्ट के फैसले को हमें सहमति देनी चाहिए ,लेकिन यह ध्यान भी रखना होगा कि विद्यार्थी को गलत राह में भटकने से रोकने के लिए विनम्रता और सहजता का रास्ता अपनाना चाहिए हम गौतम और गांधी के देश वासी हैं संयम हर मुस्किल से लड़ने का हथियार था ,है और रहेगा
बच्चे आने वाले कल का भविष्य हैं जब भविष्य ही सहमा हुआ होगा तो देश की उन्नति कैसे होगी हमे तो मुस्कराता हुआ उज्ज्वल भविष्य चाहिए
नाया सवेरा आने दो ,किरणों से किरने मिलने दो
नव ऋतू के आगमन में नव कोंपलें खिलने दो
प्रेम भाव के मंद -मंद झोंकों को तुम बहने दो
नन्हें -नन्हें फूलों को झटको न ,महकने दो
समाप्त

Read more http://kalpanadubey.blogspot.com/2009/05/blog-post_29.html

By | 2017-09-25T12:57:39+00:00 May 29th, 2009|HIndi Debates|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

Leave A Comment

Pin It on Pinterest

Share This

Share This

Share this post with your friends!