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सदन की राय में महिलाओ का नौकरी करना परिवार के लिया उपुक्त हैं-विपक्ष

//सदन की राय में महिलाओ का नौकरी करना परिवार के लिया उपुक्त हैं-विपक्ष

सदन की राय में महिलाओ का नौकरी करना परिवार के लिया उपुक्त हैं-विपक्ष

विपक्ष

नारी तुम केवल श्रदा हो, विश्वास रजत नभ पग तल में
पियूष स्तोत्र सी बहा करो, जीवन के सुंदर तल में

भारत की नारी का नाम सुनते ही हमारे सामने प्रेम, करुना, दया ,त्याग और सेवासमपर्ण की मूर्ति अंकित हो जाती हैनारी के व्यक्तित्व में कोमलता और सुन्दरता का संगम होता हैवह तर्क की जगह भावना से जीती हैइसलिए इसमे दया करुना, ममता ,त्याग के गुन अधिक होते हैनारी वह शक्ति है जो व्यक्ति को जनम देकर उसका पालनपोषण करती हैऔर उसे जीवनसंघर्ष हेतु शक्तिसंपन्न बनाती हैपरिवार को सुखी बनाने के लिए नौकरी करने से महिलायों का शारीरिक और मानसिक शोषण हो रहा हैजहाँ महिलाये दिनप्रतिदिन आर्थिकप्रगति कर रही है वाही अपने आप को खतरनाक ज़ंग में उतार रही हैवह ऐसे चक्रव्यूह में प्रवेश कर चुकी है जहाँ से निकला नही जा सकतासिसकसिसक कर दम तोड़ना ही अन्तिम सत्य है

ारी स्वतंत्रा के नाम पर वह दासता के दलदल में फंसती जा रही है। पहले की जिम्मेदारी तो उस पर है ही यानि परिवार की देखभाल , बच्चो का पालन पोषण की जिम्मेदारी तो है ही ,ऊपर से आर्थिक जिम्मेदारी भी उसी के कन्धों पर दे दी गई है। थोड़े मंहगे वस्त्रों और दो चार आभुश्नो की जंजीरे उसने स्वयम सहर्ष पहन ली है। वह खुश है या नही अब वह निर्णय भी उसके हाथ में नही रहा नौकरी के कारन ही वह अपनों से भी दूर होती जा रही है। बच्चे आज शिशुशालाओं में जा रहे है तो वृद वृदआश्रमों मेंजहाँ अपनीअपनी नियति के सभी कोस रहे है और नारी चत्त्पत्ता कर बेबसों के आंसू बहाती जा रही है ना नौकरी छोड़ पाती है, बच्चे , और ना परिवार इसी कारन महिलायों का मानसिकशारीरिक संतुलन बिगड़ जाता है
पहले जहाँ नारी की हर तरफ़ इतनी प्रगति नही थी वहां पर इतने अपराध नही थे जैसेजैसे नारी की हर शेत्र में प्रगति की सीमा बदती जा रही है वैसेवैसे अपराध की सीमा बदती जा रही है। महिलायों के लिए कितने ही असुरक्षा के द्वार खुल जाते है। नौकरी करते हुए भी उसके मन में असुरक्षा का डर जरुर बैठा रहता है। उनका शोषण हर जगह होता है। कही शारीरिक , कही मानसिक, तो कही आर्थिक आए दिन घटित घटनाये इस बात का परमान है की महिलाये आज कार्य शेत्र में कितनी असुरक्षित और मजबूर है .
नौकरी के कारन आज महिलाये अपने नैसर्गिक सौन्दर्य को खो बैठी है अब उसमे वह कोमलता रही है , नम्रता और ही भोला सौन्दर्य। यह सच है की सैकडो लड़किया सौन्दर्य पर्तियोगिताओं में भाग लेती है ये सब उनके शारीरिक सौन्दर्य को ही देखते है जो विभिन् सौन्दर्य पर्साधानो पर टिका होता है। आज उसकी गरिमा और अस्मिता का लोप होता जा रहा है। अंधाधुंध बदती भौतिकवादिता ने स्त्री को गुमराह कर दिया है। उसका सौन्दर्य बिकाऊ होता गया है। कही विज्ञापनों में नज़र आती है तो कही उत्सवो के रंगारंग कार्यकुम्भो में। लोगो का नज़रिया ही आज बदल गया है। स्त्री जाती को वे सिर्फ़ स्त्री रूप में ही देखते है। उसे प्रशासक, डॉक्टर या इंजिनियर का औदा तो बाद में ही मिलता है। बच्चो में बड़ते मनोरोगऔर आत्महत्याएं उनकी परिवरिश की और इशारा करती है। माता का कोमल स्नेह भरा स्पर्श क्या पैसो के लिए कार्य करने वाली आया दे सकती है। संस्कार तो विलुप्त होते जा रहे है। अकेलेपन को विभिन् माध्यमो से दूर करने में लगा बच्चा बचपन की उमर में ही बड़ा हो जाता है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज के माध्यम से ही देखा जा सकता है आज की सजी संवरी आधुनिक नारी परिवार से दूर होती जा रही है। परिवार उसके लिए बोझ बन गया है। कार्यकारी महिला से एक सुघड़ गृहणी की अपेक्षा करना ही ग़लत है क्योकि वह भी हाडमांस की बनी हुई है।किसी स्टील या लोह पदार्थ की नही। प्राचीनकाल से ही परिवार कल एक अंग बहार काम करता था तो एक अंग घर कल। अतः परिवार में संतुलन बना रहता था। अब यदि सूर्यउदय
By | 2017-09-25T12:56:55+00:00 March 8th, 2011|HIndi Debates|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

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