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सखा

सखा

सखा —————-

हे ! सखा , जीव कितना अकेला , कितना असहाय ,कितना असमर्थ होता है ……इस संसार में ,आज ये ज्ञान भी मुझे हों गया | अन्यथा क्या ये पांचाल देश की राज कुमारी

,हस्तिनापुर की महाराज्ञी , पांच पतियों की प्रिया ……..इस नीरव ……..हिम आच्छादित हिमालय की चोटियों के बीच जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन नहीं रही होती |

हे कृष्ण ! हमेशा की तरह इस विपत्ति में भी मुझे सिर्फ तुम ही याद आ रहे हों क्योंकि तुम्हारा स्थान मेरे जीवन में कुछ खास ही रहा है |इसलिए ही तो मैंने

तुम्हें अपना सखा माना है | मेरे ये पति आज भी अपने ज्येष्ठ का अनुकरण कर ………मुझे छोड़ कर स्वर्गारोहण के लिए आगे बढ़ गए हैं | याद है न ,केशव ! तुम्हें

जब धूर्त क्रीडा में धर्म राज कहलाने वाले मेरे पति ने मुझे दाँव पर लगा दिया था | उस समय भी मेरे ये वीर पति मेरे लिए कुछ न कर सके थे | असहाय से मेरी दुर्दशा

को देखते रहे थे |अपनी पत्नी की लाज की ,उसकी मर्यादा की ,उसके अपमान की रक्षा न कर सके थे | हे कृष्ण ……..हे माधव …….तब तुम्ही ने …..हाँ ….हाँ ……….

तुम्ही ने मेरे सखा …..तुम्ही ने अप्रत्यक्ष रह कर वह कार्य कर दिखाया जो मेरे शौर्यवान वीर पति न कर सके | हे मोहन ! …….उस दिन से मेरा ये मन तुम्हारे ही रंग

में रंग गया है |

हे हृषिकेश ! तुम अपना वादा कब भूले हों ! मुझे आज भी अच्छी तरह याद है ,जब तुम्हारी उंगली कट गई थी ,तुम्हारी पत्नी महाराज्ञी रुक्मिणी

और भामा खून का बहाव देख कर घबरा गई थी और पट्टी बांधने के लिए ढूढनें लगी थी ,तब मैंने साड़ी के चीर से आपके बहते खून को रोका था और आपने मुझ से

कहा था –“इस चीर को मैं याद रखूँगा ” | हे गिरधर ! तुमने चीर को याद ही नही रखा बल्कि उस्की मर्यादा का ,उस्की आवश्यकता को ,उस्की महत्ता को भी आपने

दर्शा दिया था | आपने परिधानों की वह अद्भुत छटा दिखाई कि आततायियों के होश उड़ गए ,आपने सिर्फ मेरी ही नही सम्पूर्ण स्त्री जाति के स्व की ,सम्मान की ,

लज्जा की रक्षा की |तुम्हारा यह कर्म युग -युग तक पथ -प्रदर्शक बना रहेगा | नरकासुर के बंधन से मुक्त की गई सोलह हजार युवतियां तुम्हारे प्रेम की पात्र बनी |

इससे हर स्त्री तुम्हारी दीवानी हों गई |

हे माधव ! आज मुझे फिर आपकी जरुरत है ,हे मोहन इस एकाकी हिम श्रंखलाओं में, मैं हिम से आच्छादित होती जा रही हूँ | प्रकृत मुझ पर मेहरवान

है | कफन की जरूरत तो सबको होती है ,मुझे यह भी नसीव नही | मैं यज्ञ सेनी ,सुगंधे ,दस भईयों की बहन और पांच पतियों की प्रिया ,बिना कफन के अन्तिम यात्रा

करे यह प्रकृत को मंजूर नही |हिम कण मेरे शरीर की ,मन की पीड़ा को कम करके मुझे अन्तिम आवरण प्रदान करने में लगे हैं |

हे सखा ! ये ……कैसा मधुर स्वर है ……..कितना अदभुत ……..कितना आकर्षक ……….कितना मोहक …….कितना …….मादक ……..स्वत: ही मन .मस्तिष्क

इसके वशीभूत हुए जा रहे हैं | हे कृष्ण !……….मैं समझ गई ……….मैं जान गई ………….तुमने हमेशा मेरी इच्छाओं का आदर किया है | मैंने एक बार तुमसे कहा था –

जो बांसुरी की धुन तुमने सखी  राधा को सुनाई थी ………गोपिकाओं को ….ग्वाल वालों को सुनाई थी …….वह मुझे भी सुनाए ……….| आपने कहा था ……पांचाली ……..

आज नहीँ …………फिर कभी सुनाऊगा ……….और आज आपने ……..मेरी यह इच्छा भी पूर्ण कर दी | देखो …..न ..कैसा सम्मोहन है इस आवाज में ………मेरे चारों-ओर

कैसा संगीत छा गया है ………शांति देने वाली ………मन को भा जाने वाली …………ये वही धुन है न माधव !

हे मुरलीधर ! ……..ये तुम्हारी मुरलिया का ही असर है जो मैं अनन्त आकाश की ऊँचाइयां छूने को तत्पर हों रही हूँ |……हे घनश्याम …….तुम्हारी

बांसुरी ये कौन सा राग छेड़ रही है , मेरा तन -मन इस शीतल वातावरण में भी ऊष्मा का अनुभव कर रहा है | हे कान्हा !….इस दूर तक फ़ैली शुभ्र आभा में मुझे सिर्फ

तुम्हारे मुकुट में लगे मोर पंख के रंगीन लुभावने रंग ही नजर आ रहे हैं ………हे गोपाल !…..ये तुम हों ……….तुम्ही तो हों ………तुम अपनी कृष्णा की पुकार न सुनो

यह संभव ही नही ………..हे नन्द नंदन ……..तुम्हारे विना कुछ संभव हों सकता है ………लेकिन ……मैं कृष्ण के बिना कृष्णा कभी नही हों सकती थी |…………तुमने

मुझे बनाया ………मुझे संवारा क्योंकि तुम मेरे अपने हों ………मेरे खास हों ,…..मेरे सखा हों …………|

हे माधव ! यदि तुम्हारा सहारा न होता ……..तो …मैं क्या होती ……….कह नही सकती | तुमने ही तो मुझे वह शिक्षा दी थी ……….वह मंत्र दिया था ..

जिससे मैं पांच -पांच पतियों के साथ निभा सकी ,उनका प्यार पा सकी ………हे मेरे सखा एक तुम्ही तो थे जिससे हर बात खुले दिल से कह पाती थी ………..तुम्ही ने

मुझे सुझाया कि मुझ जैसी ,यज्ञ से प्राप्त ,सुगन्धित ,सौंदर्य से भर पुर युवती के लिए पांच पति ही उचित होंगे क्योंकि …मैं साधारण नही ,असाधारण हूँ | मुझ पर मेरी

विशेषताओं के कारण आने वाली विपत्तियों का सामना एक व्यक्ति न कर सकेगा ……….हर व्यक्ति की चाहत लिप्सा मुझे हर क्षण भयभीत रखेगी …….सच मेरे सखा

…..तुमने मुझे असाधारण बना दिया ………..|

हे मोहन तुम्हारी ये मन मोहनी मुरली जितनी मुझे प्रिय लग रही है उतनी ही प्रिय तुम्हारे पंचजन्य की ध्वनि है | तुम्हारे पञ्च जन्य शंख के नाद

ने अन्याय ,अधर्म व अत्याचार के प्रखर स्वर को धूमिल ही नही किया बल्कि उन्हें मृत कर दिया | हे माधव ! यदि तुम्हारा शंख न बजा होता तो संसार का ,भक्तों का ,

साधुओं का स्त्रियों का सभी का विश्वास ,सत्य ,धर्म और विजय से उठ जाता |

हे मेरे प्यारे गोविन्द ……मुझे स्मरण है कि किस तरह तुमने मुझे अतिथि सत्कार के लिए कुछ न होने पर ,मेरे असमंजस को भांप कर ,मेरी अश्रु पूरित

आँखों को देख कर मेरे वर्तन से चिपका चावल का कण खा कर ,मुझे कृतार्थ कर दिया था | हे नटवर !…….तुम्हारी दूर दृष्टि को ,तुम्हारे कार्यों को कौन जान पाया है !

तुमने उस चावल के कण को खा कर ,अन्न के महत्व को और अतिथि के सत्कार को गरिमामय बनादिया |

हे गिर धर ! पांचों पुत्रो के वध पर विकल होती माँ को ,सत्य का ,संसार की नश्वरता का जहाँ ज्ञान कराया वहाँ मुझे यह भी अहसास कराया

कि” वाणी का वाण” अचूक होता है ,वह अपना प्रभाव दिखाए बिना नही रहता |इस वाण से नाश अवश्यंभावी होता है |हे मोहन मैंने इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई है|

तुम्हारा साथ ,तुम्हारा सहारा न होता तो यह दुःख सहन न होता |

हे केशव ! तुमने मुझे साखी कहा ,माना ,निभाया …………यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है |आज मैं जीवन के अन्तिम क्षणों में तुम्हें पुकार रही

हूँ |सब कहते हैं कि तुम चले गए हों |तुम ……तुम कृष्णा का साथ छोड़ सकते हो !तुम हो ….तभी तो तुम्हारी मुरलिया मुझे बुला रही है………….| तुम हो तभी तो मैं

तुम्हें महसूस कर रही हूँ ……….तुम तो इस बर्फ के कण -कण में प्रकृति के त्रण -त्रण में ,सघन में ,विरल में ,तम में ,प्रकाश में ,इला में ,अरुण में ,अंतरिक्ष में ,पाताल में

……तुम हो |……..तुम तो सर्व व्यापी हो ,सर्व शक्तिमान हो ,सर्वग्य हो ,तभी तो तुमने मेरे आर्त नाद को सुन लिया और पवन पंखों पर मोहनी मुरली की ध्वनि के मिस

मुझे बुलाने का संदेस भेज दिया ……..तुम्हारा संकेत ही मेरे लिए तुम्हारा आदेश है …………मैं आ रही हूँ ……….हे सखा !……….मैं चल पडी हूँ …..बस अब…आ ….

रही हूँ ………………….|

………………………

By | 2017-09-25T12:27:56+00:00 July 26th, 2011|Hindi Blog & Stories|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

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