संत और असंतों की पहचान —–

१  संत असंतन की अस करनी |

जिमि कुठार चन्दन आचरणी ||

{संत और असंतों में वही अंतर है जो कुल्हाड़ी और चन्दन में है |कुल्हाड़ी चन्दन के वृक्ष को काटती है ,तो चन्दन उसे अपनी खुशबू से भर देता है |

अर्थात संत व्यक्ति बुराई करने पर भी बुरा नहीं करते बल्कि अच्छा ही करते हैं |}

२ काटइ परसू मलय सुनि भाई |

निज गुण देहि सुगंध बसाई ||

{काटने पर भी चन्दन खुशबू से भर देता है | यह संतो की पहचान है |}

३ शम दम नियम नीति नहि डोलहि |

परुष वचन कबहुं नहिं बोलहिं  ||

{संत कभी भी नियम ,संयम नीति और इंद्रियों के दमन से नहीं चूकते एवं कठोर वचन नहीं बोलते }

४ जहँ कहूँ निंदा सुनहिं पराई |

हर्षहि मनहुं परी निधि पाई ||

{असंत जब कहीं किसी की निंदा सुनते हैं तो बहुत खुश होते हैं जैसे पड़ा हुआ धन मिल गया हो }

५  बैर अकारण सब काहू सों |

जो करि हित अनहित ताहू सों ||

{असंत सब से दुश्मनों जैसा व्यवहार करते हैं ,जो उनके साथ बुरा करे उससे भी और जो भला करे उससे भी |}

६ बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा |

खाहिं महा अहि हृदय कठोरा  ||

{असंत मोर के समान मधुर वचन बोलते हैं लेकिन उनका हृदय इतना कठोर होता है कि वे सर्प को भी खा जाते हैं |}

७ स्वारथ रत  परिवार विरोधी |

लंपट काम लोभ अति क्रोधी  ||

{असंत अपने परिवार के विरोधी हो जाते हैं |गलत कार्य करते हैं |कामी लोभी और क्रोधी होते हैं |}

८ जब काहू पे आवे विपत्ति |

खुशी होय मनु हो गए नृपति ||

{असंत किसी को परेशानी में देख कर खुश होते हैं मानो उन्हें राज -पद मिल गया हो|}