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विदेश में बसने -विपक्ष

//विदेश में बसने -विपक्ष

विदेश में बसने -विपक्ष

जो भरा नही है भावो से,
बहती जिसमे रसधार नही,
वह ह्रदय नही वह पत्थर है,
जिसमे स्वदेश का प्यार नही

हमारे नवयुवको में विदेश में जाने की इच्छा दिनप्रतिदिन बलवती होती जा रही है. .अपने देश के प्रति आस्था, कर्मठता , और चिंता के भाव विलुप्त हो रहे है. ऐसा लगता है जैसे शिक्षित व्यक्तियों को अपने देश के प्रति आस्था रही है और देशवासियों के प्रति . ह्र दय पाषण हो गया है. जिसमे कोई चेतना है और ही अपनेपराये की पहचान .

हम पलतेबड़ते तो अपनी मात्रभूमि में है और जब कुछ करने का समय आता है तो इसे छोड़कर चल देते हैं. हमारे चिकित्सक,अभियंता विदेशो का रुख करते जा रहे हैं.

अगर विदेश जाने का मुख्य कारन पैसा और बदती सुखसुविधाओ का आनंद है तो नही चाहिए हमें ऐसा आनंद जो हमारी मात्रभूमि के लिए रास्ते का पत्थर साबित हो .

चाहे विदेशो में कितने ही डॉलर कम ले उस राष्ट्र के लिए आप दुसरे दर्जे के नागरिक ही रहेंगे. वह अधिकार और विश्वास कभी नही मिलेगा जो अपने देश में मिलता है .

सोने की चिडिया कहा जाने वाला राष्ट्र फ़िर उसे प्राप्त करने हेतु अग्रसर हैं. हमारे देश में आज ऐसी सुविधाए मौजूद है जो नवयुवको को उज्जवल भविष्य देने की क्षमता रखते हैं. उनकी योग्यता का सम्मान करते हैं. भारत विश्व की ऐसी उभरती शक्ति हैं जो निजी क्षेत्र की कंपनियों में काम करने वालो को विदेशो की तुलना में कही अधिक वेतन भी दे रही है. फ़िर विदेशो में बसने की क्या अव्शाकता. है . जहाँ होली के रंग है और ही काग के गीत. जितनी स्वतंत्रता हमें अपने देश में मिल सकती है . विदेशी नागरिक हमेशा द्विटी श्रेणी में आते हैं.

अरे !—इस देश में तो अपने लोग हैं . ,अपनापन हैं. . यहाँ का अनूठा प्राकरतिक सौन्दर्य हैं , एक अनोखी संस्कृति हैं. जो हमें विश्व के सभी देशो से अलग पहचान दिलाती है . क्या कोई देश भारत जैसा हो सकता हैं.

फैला मनोहर गिरी हिमालय
और गंगाजल कहाँ,
सर्वोच्च देशो से अधिक,
किस देश का उत्कर्ष हैं,
उसका, की जो ऋषिभूमि हैं,
वह कौन ? भारतवर्ष हैं.

अब बस ——–बहुत हो चुकी दुसरो की सेवा और उनकी उन्नति. अब हमें अपने देश का सितारा बुलंद करना हैं. और अब वह वक्त गया है जब हमें अपने राष्ट्र को आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक शेत्र में एक अलग पहचान दिलानी है.

प्राचीन काल में जो हमारा अस्तित्व था वाही फ़िर प्राप्त करना है, यह कुछ मुश्किल कार्य नही है. अव्शाकता है एक द्रिडसंकल्प और इचाशक्ति की क्योकि हम उन्ही पूर्वजो की संतान है जिन्होंने ने विश्व में भारत की पहचान कराई थी.


वही है रक्त ,वही है देश वही सहस, वैसा ही ज्ञान
वही हैं शान्ति, वही है शक्ति, वही है हम दिव्यआचार्य संतान
जिए तो सदा इसके लिए , य ही अभिमान रहे यह हर्ष ,
निछावर कर दे हम सर्वस्व , हमारा प्यारा भारतवर्ष,
हमारा प्यारा भारत वर्ष |

समाप्त |||.

By | 2017-09-25T12:53:34+00:00 March 10th, 2011|HIndi Debates|2 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

2 Comments

  1. Administrator June 14, 2012 at 12:15 pm - Reply

    धन्यवाद

  2. RISHABH April 8, 2012 at 12:15 pm - Reply

    It’s very good.

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