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युवाअवस्था फूलो से भरी हैं तो प्रोदावस्था जीवन संघर्षरत और वृदावस्था पस्चावस्था से परिपूर्णयह एक वाक्य आज के समाज को सम्पूर्ण झांकी को प्रस्तुत कर देता हैंआधुनिक समय में समाज में व्याप्त कुंठा , ग्लानी , दुःख , अवसाद सब कुछ झलक पड़ता हैआज का युवा वर्ग द्विग-भ्रमित है इसलिए गलतियों पर गलतिया करता चला जा रहा हैघर और स्कूल में उसे निरंतर इमानदारी, प्यार, स्नेह और अहिंसा का पाठ पदाया जाता हैउच्च आदर्शो की बातें की जाती हैंऔर इनका भोला मस्तिष्क इन बातो को ग्रहण भी कर लेता हैंऔर भविष्य के सुनहरे भविष्य के सपने संजोने लगता हैंलेकिन जब यही बालक युवा बन कर समाज में कुछ करना चाहता हैं तो सब कुछ उसे उल्टा नज़र आता हैंजिन आदर्शो को लेकर वह युवा हुआ उसका वास्तविकता में कही नामोनिशाँ नही मिलता
इमानदारी ,निष्ठा , कर्तव्य की बातें उसे यथार्थ के धरातल पर सत यु गी नज़र आते हैं और वह भटका हुआ सा –चोराहे पर स्वयम को पाता हैंकहाँ जाए? किधर जाए ? क्या करे ? कुछ समझ नही पाता , और फ़िर शुरू होता है उसके सिदंतो और आज के भ्रष्टाचारी माहोल में जीवन की जद्दोजेह्हदकभी वह सत्य और निष्ठां का सहारा लेकर जीवन भर संघर्ष करता रहता हैकभी भरष्टाचार को अपना कर ग्लानी का अनुभव करता हैंजो मानसिक अशांति का कारन बनता हैंअब वह नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करता हैंविडम्बना देखिये की वह जिन आदर्शो को लेकर बड़ा हुआ है उन्ही का त्याग कर वह दिनप्रतिदिन उछ्र्न्खाल बनता चला जाता है और वह नही समझ पाटा की क्या ग़लत है और क्या ठीक है। जिसे वह मानना चाहता है उसे समाज नही मानताइसलिए वह भविष्य की चिंता छोड़ सिर्फ़ आज में विश्वास करने लगता है
यही से वह स्वार्थी बन कर सुखभोग की लालसा में गलतियों के भरमार में फंस जाता हैजीवन के लिए संघर्ष करतेकरते वह प्रोदावस्था में कब पहुँच जाता है पता ही नही लगतासभी उतरदायित्व मुह फैलाये उसके सामने विभिन् रूपों में खड़े होते हैंजिसे सुलझाने के लिए उसे कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं। वह कही पुत्र का दायित्व तो कही पिता का दायित्व पूर्ण करने के लिए संघर्ष-रट रहता हैंयह संघर्ष तब तक जारी रहता है जब तक वह थक कर चूरचूर नही हो जाता
जीवन के अन्तिम पड़ाव में उसे लगता हैं की उसका जीवन व्यर्थ गया क्योकि ना तो वह अपने ढंग से जी सका दुनिया के ढंग से मन की शान्ति पा सका तन कीतब पश्चाताप का एक अटूट सिलसिला शुरू होता हैं क्योकि अभी तक उसे माया मिली राम’ ।
कहाँ जाता है जैसा करोगे , वैसा भरोगेयुवावस्था की गलतियों का फल प्रोदावस्था में भुगतना पड़ता हैंऔर उससे उपजी ग्लानी और कुंठा उन्हें प्रायश्चित के लिए मजबूर करती हैं.
 
आज समाज का हर प्राणी चाहे वह बच्चा हो , जवान हो या बुदा हो वह असंतुष्ट और भोख्लाया सा नज़र आता हैंभौतिकवाद ने उसे कही का नही छोड़ाव्यक्ति सुख के साधन जुटाने में इतना जुटा है की वह साध्य को भी भूल गया हैयही इन भूलो का , संघर्षो का और प्रायश्चित का मूल कारन हैकबीर ने कहा है
जवानी नींद भर सोया, बुडापा देख कर रो या
सच है संघर्षो के बाद जब कुछ हासिल नही होता तो रोना ही आता है
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