[ultimatemember form_id=12643]

मिलही न जगत सहोदर भ्राता

///मिलही न जगत सहोदर भ्राता

मिलही न जगत सहोदर भ्राता

जीवन में स्मृतियों का जितना महत्व होता है उतना ही बचपन में घटित घटनाओं का ,जो हमें याद तो नही होती लेकिन माता -पिता और पारिवारिक जनों से इतनी सूनी होती हैं की वे अनुभूतियाँ बन जाती हैं इसी ही एक घटना मुझे बार -बार गुदगुदाती है और प्रेम से सराबोर कर जाती है
मां बताती थी कि जब मैं करीव एक साल की थी तब मां को किसी काम से थोड़ी देर के लिए बाहर जाना पडा वे मुझे भाई के साथ ,जो मुझसे मात्र चार साल बड़ा था ,छोड़ कर चली गयी और दरवाजा बंद कर गयी जाते -जाते मुझे कुछ खाने को दे गयी जल्दी में सीडियों का दरवाजा बंद करना भूल गयी उन्ही सीडियों से एक मोटा बन्दर नीचे आ गया वह भी मेरे साथ खाने लगा पास खेलते भाई ने जब देखा तो मुझे नन्ही बाँहों में भर लिया और जोर -जोर से रोने लगा मां ने आवाज सूनी तो दौड़ती हुई आई उन्हें देख कर बन्दर खाने का सामान लेकर भाग गया लेकिन मेरा अग्रज अभी भी मुझे छाती से चिपकाए दहाडें मार रहा था
मां ने चुप कराते हुए कहा –
“बन्दर भाग गया ,अब क्यों रो रहा है ?
“लली को बन्दर खा जाता तो ?
और ……तुझे खा जाता तो ……?
वह नन्हा बालक विस्फारित नेत्रों से देखता ही रह गया ,बहन के स्नेह ने अपने बारे में कुछ सोचने ही कहाँ दिया था यह तो बचपन की भाई है ,वह आज भी एसा ही है
याद आती है मुझे एक घटना ,जब मैं लगभग नौ साल की होउंगी पन्द्रह अगस्त के कार्य -क्रम में दौड़ में मैंने भी भाग लिया था मैं उस दौड़ में द्वितीय स्थान पर रही मुझे एक सुंदर सा डिब्बा मिलाथा उस समय मैंने अपने भाई की ग्रीवा में जो गर्व देखा था उसे शब्दों में बांधना मेरे लिए सम्भव नही
मैं किसी भी कार्य -क्रम में भाग लेती चाहे वह स्कूल का हो बाहर का भइया के निर्देशन में ही होता एक बार मुझे जन्म-अष्टमी पर नृत्य प्रस्तुत करना था मैं भइया से पहले चली गयी नृत्य के बाद मैंने घर वालों को ढूंडा ,वे मुझे दिखे नही ,जबकि वे मुझे ही ढूंड रहे थे मैंने वगैर इंतजार किए घर का रास्ता पकडा भयंकर वारिश हो रही थी ,पता नही कैसे मैं अकेली घर पहुँच गयी दरवाजा बंद था ,मैं वहीं बैठ कर रोने लगी थोड़ी देर में देखा कि मेरा भाई छाता लिए मुझे देखने आ रहा था हर मुसीबत में जब भी सहारा चाहा वह मुझे पास ही मिला
जब हम लोग पढ़ते थे ,उस समय फ़िल्म देखने या बाहर घुमने की अनुमति मिलना उतना ही मुश्किल था जितना इमरजेंसी में छुट्टी मिलना लेकिन मेरा चतुर भाई किसी न किसी तरह यह कार्य कर ही लेता और सहभागिनी बनती मैं मां को अपनी ढाल बना हम यह काम कर ही डालते
पिता के स्वर्गारोहण के बाद हमने अपने छोटे भाई का विवाह किया काफी मेहमान आ गये थे ,सभी पीछे के आँगन में बांते कर रहे थे सर्दियों के दिन थे ,मैं करीब ग्यारह बजे पहुँची बच्चे कार से उतरते ही नानी के पास दौड़ गए मैं भी अन्दर चली …द्रौईंग रूम के पास वाले कमरे में पिताजी का चित्र देख कर मैं उधर मुड़ gई उसके सामने खडी हुई कि भरा दिल उमड़ पड़ा दृष्टि धुंधली हो गयी ,शुभ अवसर पर आंसूं न बहाने का संकल्प बिखर गया मैं आंसुओं को रोकने की असफल चेष्टा कर रही थी कि मैंने अपने सर पर स्पर्श महसूस किया मुड़ कर देखा ,मौन खड़े भइया मेरा सर सहला रहे थे आंखों मेंआंसू थे लेकिन मुझे सर हिला कर रोने से रोक रहे थे आंसू पोंछ में पिता तुल्य भाई के पीछे चल पडी यत्न से छुपाए आंसू आंखों पर अपनी छाप छोड़ गये सबने देखते ही पूछा –
“रो रही थी क्या ?’
भइया ने कहा –
“ससुराल में मजे करके आयी है ,यहाँ काम करना पडेगा ……….रोयेगी नही क्या ……….?
सारे हंस पड़े ,में और भैया भी इसमें शामिल हो गये
जीवन के उतार -चढाव को मेरे भाई ने बहुत भोग है बीस वर्ष तक एक ही टी एस्टेट में शानदार नौकरी की ,लेकिन समय और भावः को कोई नही जान पाया है किसी की कमियों का खामियाजा कब ,कौन भुगतेगा कोई नही जानता नौकरी छोड़ दी ……….और दुसरी के लिए प्रयत्न जारी रहे ……….कभी मिली ….कभी छोडी ……फ़िर मिली ….फ़िर छोडी का क्रम चलता रहा लेकिन उन्हें कभी हताश और निराश नही देखा जिन लोगों ने धोखा दिया उन्ही की सहायता की
अदम्य साहस ,धैर्य ,शक्ति ,हिम्मत और सूझ -बुझ का उन्होंने परिचय दिया बच्चों की पढाई हो या परिवार की कोई जिम्मेदारी हो हमेशा ही उन्होंने पूर्ण सहयोग दिया
हमेशा पढ़ती और सुनती आई हूँ कि जो व्यक्ति सुख -दुःख को ,मान अपमान को समान भावः से ग्रहण करता है ,वह संत पुरूष होता है
मुझे इसे ही भाई की भगिनी होने का सौभाग्य प्राप्त है

By | 2017-09-25T12:37:50+00:00 March 10th, 2011|Hindi Blog & Stories|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

Leave A Comment

Pin It on Pinterest

Share This

Share This

Share this post with your friends!