उननो, मिस्रयो, रुमा, सब मिट गए जहाँ से ,
बाकी अभी तक है नामोनिशा हमारा.”

बड़े ही सौभाग्य और गर्व की बात हैं की भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से सम्पुरण विश्व में सर्वश्रेष्ट रही. विश्व ने उसका लोहा माना और उसे स्वीकार किया. फ़िर चाहे वह अमेरिका की भगिनी निवेदिता हो या रूस के ताल्स्तॉय .

लेकिन आज ये बात कहाँ?. आज हमारी संस्कृति अपना अस्तित्व ही खोती जा रही है. ऐसे में क्या यह उचित होगा की इसी संस्कृति से आज विदेशी प्रभावित हो. में इससे बिल्कुल सहमत नही हु.

अगर आज दोचार विदेशी भारत में आकरहरे राम हरे कृष्णकर रहे है तो इसका मतलब यह नही की वह भारतीय संस्कृति से प्रभावित है. प्रभावित वे तब होंगे जब दोचार नही बल्कि उनका पुरा देशहरे राम हरे कृष्णकरे. हमारे रीती रिवाजो की इज्जत करे, हमारे संस्कारों को समझे.

आज हमारे युवा अपने देश और संस्कृति को भूलकर विदेशी रंग में क्यो रंगते जा रहे है. फ़िर चाहे वह भाषा हो या संस्कृति.

हमारे भारतीय जाते तो धोती –kurte में हैं और आते पेंट शर्ट में . आप मुझे ही देख लीजिये मेरी टाई, मेरी स्कर्ट, और मेरी शर्ट . क्या ये भारतीय संस्कृत का प्रभाव है.?

सभी जानते हैं की जाने कितने भारतीय विदेशो में जाकर बस चुके हैं. और ना जाने कितने जाने की तैयारी में है . क्या वे वहां पर भारतीय –sanskriti का प्रचार करने के लिए रह रहे हैं. नही, वे वहां की चकाचोंध , रेहानसेहन और पहनावे से प्रभावित हो कर रह रहे हैं. परन्तु कोई विदेशी अब भारत में आकर क्यो नही बस रहा . आज विदेशी यहाँ आकर स्वयम हमारे रंग में नही रंगता परन्तु हमारी गरीब जनता को थोडी सुविधाए देकर गुमराह करते हैं.

विदेशी कंपनियों का आगमन हमारी संस्कृति के कारन नही है . वे हमारे देश में सिर्फ़ व्यवसाय कर रहे हैं . हमारी संस्कृति से तो वे प्रभावित तब भी नही हुए थे स्वतन्त्रता से तिन सो वर्ष पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में वे हमारे देश में व्यापार करने आए थे . वे स्वार्थी थे और आज भी है. प्रत्यक्ष परमान ये हैं की वे यहाँ आकर हमारी संस्कृति को धारण नही कर रहे बल्कि हमारा शोषण कर रहे हैं . और अपनी संस्कृति को यहाँ फैला रहे हैं. कुछ ही दिनों में यह विश्बले हमारे देश में फल जायेगी.

आज गलीगली में खुले कॉलसेंटर इस बात का परमान है . रात –raat भर जागकर हमारे युवा भारतीय अपने देश के लिए नही बल्कि दुसरे देशो के लिए कार्य करते हैं. उनका रेहानसेहन , भाष , संस्कृति आदि भी उन्ही देशो के अनुकूल होती चली जाती हैं.

विदेशियों के साथ हमारे दूरव्यवहार ने आज विश्व के सामने हमें शर्मसार कर दिया है . विदेशी महिला अधिकारी के साथ बलात्कार की घटना ने आज हमें कलंकित कर दिया हैं . हमारे युवा विदेश में सिर्फ़ ख्याति अर्जित नही कर रहे बल्कि अपने काले कारनामो से हमारी संस्कृति को बदनाम कर रहे है. विदेश में कोहली ने विदेशी लड़की के साथ बलात्कार और हत्या करके स्वदेश का नाम कितना गिराया हैं. ये सभी जानते हैं. .

संस्कृति कोई वास्तु नही है जिसे सर पर उठा कर ऊँचा रखा जा सके . यह तो हमारे व्यवहार से , हमारे कार्यो से , हमारे आचरण से ही पल्लवित होती है. नैतिक –patan ने ही हमारी संस्कृति को सती पहुंचाई हैं. विदेशी प्रयातको के साथ लुट और हत्या की खबरे आए दिन आती रहती हैं . क्या कोई ऐसे माहोल में हमारे संस्कृति को अपनाने की हिम्मत करेगा.

आज अवश्यकता है आत्मचिंतन की . हम विचार करे की ऐसा क्यो हो रहा है ? हम क्या और कोण से कदम उठाये जिससे हमारी संस्कृति पुनः उच्च स्थान प्राप्त कर सके .

हम कोण थे और क्या हो गए ,
और क्या होंगे अभी,
आओ विचारे आज मिलकर,
ये समस्याए सभी.”

हम सभी संकल्प ले की हम अपनी संस्कृति को अक्षुन रखेंगे और शान से कहेंगेसारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा.