विपक्ष

 

बदलेबदले से आसार नज़र आते है ,
अब तो जगहजगह मुझे फास्टफ़ूड खाते
बीमार नज़र आते है। “
ये फास्ट फ़ूडइन्होने तो हमारी जीवन शैली को ही बदल डाला हैबदल क्या , नष्ट ही कर डाला हैभारतीय खानपान की शैली को पथभ्रष्ट ही कर डाला हैदूर कर दिया हैयुवाओ को ममता की ठंडी छाओ से
 
कहते है की दिलो के रास्ते पेट से होकर जाते हैमाँ बच्चे को दुलारती है , पुचकारती है ,तब उसे अपने हाथो से बना स्वादिष्ट, स्वछ मखन वाला परांठा खिलाती हैपरन्तु अब बच्चा मांगता है मैगी जिसमे सिवाय मैदा के और मसालों के कुछ नहीभला पैकेट में बंद चीजों में माँ की ममता कैसे समाएगी



हमारा देश कृष्ण भगवन का देश हैजहाँ उन्हें माखन-चोर भी कहा जाता हैवह मटकी से माखन और दही चुराचुरा कर खाते थे परन्तु अब कृष्ण की धरती पर बच्चे खा रहे हैपिज्जा, बर्गर, नुडल्सये कैसी जीवनशैली हैजहाँ आराम से बैठकर खाने का समय नही हैपहले ज़माने में पुरा परिवार बैठ कर आराम से भोजन खाता थाजिससे उनका आपसी प्रेम बढता था



परन्तु आज फास्टफ़ूड के कारन युवा पीडी घर का खाना खाने से कतराती हैऔरकामकाजी पुरूष और महिलाये भी हल्काफुल्का खाककर चले जाते है और फ़िर कैंटीनमें खाते है फास्टफ़ूड



हाँ | जीवन तो आसन हो गया है क्योकि रसोई घर में कम समय देना पड़ता हैपरन्तुमेरे मित्रपूर्वी और पच्छिमी सभ्यता का संस्कारी अन्तर यदि अधिक है तो वह हमारीरसोई और भोजनशैली के कारनभारतीय परिवार रसोई घर को मन्दिर मानते हैउसके स्वाद और पेट को तृप्ति घर के भोजन से ही मिलती है



फास्टफ़ूड से नुक्सान भी झेलने पड़ते हैजरुरु नही की बहार का खाना हमेशा साफ़ ही होऐसा होने पर पेट ख़राब हो जाता हैबासी खाना खाने पर फ़ूडपोइसिनिंग होजाती है अर्थात खाना विषवाट हो जाता हैजितने का खाना नही होता उससे ज्यादा डॉक्टर को देना पड़ता हैऔर जान के लाले पड़ जाते है वो अलगहमारा देश तो विभिन् प्रांतीयपकवानों का देश हैयहाँ विभिन् प्र कार के व्यंजन बनते हैहमेंअपने देश को फास्टफ़ूड का गुलाम होने से बचाना हैक्योकि पेट और जिव्यहा आपसी शत्रु हैजीभ सिर्फ़ स्वाद मांगती है और पेट तृप्तिस्वाद लालची है और तृप्तिमोक्ष लालच को छोड़ो और तृष्णा को अन्न के अमृत से तृप्त करो

 

यह समझो और समझाओ ,
फास्टफ़ूड से ख़ुद को बचाओ,
दालरोटी खाओ ,
प्रभु के गुन गाओ .
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