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प्रमुख लोगों की दुर्बलताएँ

///प्रमुख लोगों की दुर्बलताएँ

प्रमुख लोगों की दुर्बलताएँ

प्रमुख-लोगों-की-दुर्बलताएँ

युधिष्ठिर…..क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी युद्ध के प्रति घोर वितृष्णा मेरे चरित्र की दुर्वलता है |
अर्जुन …….माँ के वचन रख कर मैंने द्रोपदी के साथ ;विवाह किया ;इस बात पर मन में क्षोभ होता है |मन करता है वह सिर्फ मेरी होती |यह सोचना मेरे
चरित्र की दुर्वलता है |
भीम …….भोजन में जैसे मेरा ज्यादा भाग है पांचाली के भोग में भी मेरा भाग अधिक रखा जाता |ऐसा न करने के कारण कृष्णऔर कृष्णा{द्रोपदी }पर क्षोभ
आता है |मैं कुछ अधिक भोजन करता हूँ अत: सदा विपत के मुंह धकेल देते हैं ,अत: भाईयो और माँ पर मान होता है |
नकुल ……कृष्णा रूप में मुझसे भी श्रेष्ठ है ;अनिंद्य है अत: उन पर ईर्ष्या होती है |
सहदेव ……मेरी दुर्वलता मेरी माँ है |कुन्ती पुत्र के रूप में परिचय देकर हम गर्व करते हैं |परन्तु हमारी जन्म दात्री पांडु_पत्नी माद्री का नाम धीरे -धीरे विस्मृत
होता जायेगा ;कभी इतिहास से लोप हो जाएगा |माता -पिता की स्मृति को अमर रखना पुत्रों का कर्तव्य है|अत: मेरी दुर्वलता क्या स्वाभाविक नहीं?
द्रोपदी ……..मेरे हृदय की पहली दुर्वलता है प्रिय बंधु कृष्ण |मेरे जन्म के समय नामकरण की घड़ी से ही मुझे लगता था कि किसी अलोकिक पुरुष कृष्ण के साथ
कृष्णा का अदृश्य अपार्थिव और अविच्छेद संपर्क है |मेरी दूसरी दुर्वलता है कुन्ती पुत्र ,मेरे नारी ह्रदय की सवेंदनशीलता कुन्ती पुत्रों को पार नहीं कर सकी |ज्येष्ठ
कुन्ती पुत्र से लेकर कनिष्ठ कुन्ती पुत्र तक ;सबके प्रति मेरे मन में आकर्षण है |मेरी तीसरी दुर्वलता है श्रेष्ठ अर्जुन |अर्जुन वीर और नम्र हैं अत:पांडव संसार का
सारा दायित्व उन्हीं पर डाल दिया जाता है|एक की साधना का फल चारों भोग करें ;यह कैसा न्याय है?मैंने पाँचों पांडवोंको बांध रखने के लिए जीवन को उत्सर्ग
किया है |
कृष्ण…….मेरी दुर्वलता तो स्वर्ग ,मर्त्य ,पाताल सर्वत्र व्याप्त है |अनन्त विश्व ब्रह्मांडके साथ खेलना मेरी दुर्वलता है |मुझे जो अति प्रेम करता है ,उसे ही अधिक
परेशान करता हूँ |जो सोचते हैं कृष्ण मेरे हैं मैं उसके पास माया बन जाता हूँ ,जो सोचता है मैं कृष्ण का हूँ उसके पास मैं बंधक हो जाता हूँ |जिसे गढता हूँ उसे
तोड़ता भी हूँ |इसी में आनंद है |
माँ ………इतिहास के पन्नों में बेटा जीवित रहने पर माँ का दुःख नहीँ मिटता ,वीरोचित मृत्यु वरण कर अमर बनाने के लिए कोई माँ पुत्र की मृत्यु कामना नहीं
करती |
मनुष्य ………जीवन की विस्तृत अनुभूति के बावजूद जीवन सदा सुख -दुःख ,सम्पद -विपद ,मिलन -विरह ,जन्म-मरण के रहस्य में ही रह जाता है |
नशा ……..कोई भी नशा हो विपद जनक होता है |दान के नशे के कारण ही बाली पाताल गए |द्यूतक्रीड़ा के नशे में मिली पराजय और अपमान को युधिष्ठिर जीवन भर
न भूले ,उनके धर्म निष्ठ होने पर प्रश्न लग गए |नशा ;पता नहीं कैसी प्रति हिंसा का मौका ढूढें वह मन ही मन |
विशेष टिप्पणी……
किसी अज्ञानी को खुद फैसला करने का शौक रखने दो ,किसी निम्न पद के व्यक्ति को बड़े -बड़े निर्देश देने का शौक रखने दो किसी समकालीन व्यक्ति को आदिम तौर -तरीकों
की तरफ लौट जाने का शौक रखने दो ,इन बातों से निश्चय ही सर्व नाश होता है |

By | 2017-09-25T12:33:45+00:00 May 22nd, 2011|Hindi Blog & Stories|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

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