पुरस्कार किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को , कार्यो को , रचनाओ को , शैली को निखारने का कार्य करता है . दुसरे शब्दों में कहू तो में कह सकती हु की पुरस्कार किसी व्यक्ति को उसके अच्छे कार्यो के लिए प्रोत्साहन स्वरुप दिया जाता हैं. सदन के मत से ये पुरस्कार ही भरष्टाचार का कारन हैं. में इसे सरासर ग़लत मानती हु . . पुरस्कार तो व्यक्ति में स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना जगाते हैं. यदि ऐसा होता तो पुरस्कारों की पड़ती समाप्त हो गई होती. आज पुरस्कारों की सीमा घर, परिवार और राष्ट्र तक ही सिमित नही है . ये सीमाओं को लाँघ चुके हैं. चाहे ये खेलो में मिलने वाले पुरस्कार हो, या शिक्षा , साहित्य, विज्ञानं या समाज सेवा से सम्भंदित हो. इन पुरस्कारों ने व्यक्ति को विश्व स्टार पर लाकर खड़ा कर दिया है. इन पुरस्कारों के प्रति लोगो की चाहत कितनी अधिक हो गई है और उसके लिए इन पुरस्कारों को प्राप्त करना उनका उद्देश्य बन गया है.

शान्ति, विज्ञानं. साहित्य और अर्थशास्त्र पर मिलने वाले नोबलपुरस्कार ने व्यक्ति को राष्ट्र का ही नही बल्कि विश्व का सर्वश्रेष्ट स्थान प्रदान किया हैं. सोभाग्यशाली है वे लोग जिन्हें ये पुरस्कार मिले हैं. इस पुरस्कार की कामना करना और इसके लिए पर्यटन करना , अपराध तो नही. अपराध तो तब होगा जब लोगो को इससे वंचित कर दिया जाएगा. खेलो के शेत्रो में ओलंपिक में मैडल प्राप्त करना हर खिलाड़ी का सपना होता है. इसके लिए पर्यटन करना , क्या ग़लत है. ..

लोग चाँद और सूरज में कमिया देख लेते हैं. उर्जा का स्तोत्र सूर्य भी लोगो को भीषण गर्मी से तपा देता हैं. सूखे का कारन बनता है. इसका मतलब यह तो नही की सूर्य का महत्व कम हो जाएगा. शीतल चांदनी और शान्ति देने वाला चाँद भी लोगो को निगाहों में कलंकित है. इससे उसकी शीतलता में कमी नही आती. यही मेरा मानना है की भर्ष्टाचार का सहारा लेकर इन पुरस्कारों को दूषित किया जाए . पुरस्कार व्यक्ति की प्रतिभा को दर्शाते हैं. उसे मान, सम्मान, यश, धन, कीर्ति उसे सब प्रदान करते हैं. फ़िर उसे भर्ष्टाचार का कारन मानना कहाँ तक उचित है

भ्रष्टाचार पनप रहा हैलोगो की नियति में , उनकी सोच में, उनकी भावना में, उनके कार्यो में, व्यवस्था में, स्वार्थ में . और इसके लिए कलंकित किया जा रहा है पुरस्कारों को. यह सच है की इन पुरस्कारों को प्राप्त करने में व्यक्ति अदिचोटी का जोर लगा देते हैं..साथ ही कुछ ग़लत हत्कंदो को भी अपनाते हैं. अतः. आज जरुरत है चुस्तदुरुस्त रहने की . इस भ्रष्टाचार रूपी धुन से बचने की अन्यथा यह धुन एक दिन सारे मैडल सारे पुरस्कार चाट कर जाएगा.

मेरे साथियो ने भ्रष्टाचार की बहुत सी misaale पेश की है. . क्या कही भी यह सिद्ध होता है की भ्रष्टाचार के पिच्छे पुरस्कारों का हाथ हैं . पुरस्कार तो उस ध्रुव तारे की तरह है जो स्थिर रहकर सब को दिशा दिखाते हैं. सबकी योग्यता का माप्दुन्द होते हैं.

यह सच है की पुरस्कार सिर्फ़ एक मैडल या प्रशसित पात्र नही होता , वह यश , धन , समान का सूचक और विस्तारक होता हैं. , यही लालच , यही पाने की चाहत ही तो व्यक्ति को कुच्छ कर गुजरने की प्रेरणा देती है. यह अलग बात हैं की लोग इसे ग़लत ढंग से प्राप्त करने की कोशिश करते हैं. इसे आप भ्रष्टाचार कहना चाहे तो कह सकते हैं.

हीरे की अगर चमक ज्यादा हैं , कीमत ज्यादा है तो इसमे हीरे का क्या दोष . . प्राचीन काल से ही पुरस्कारों का प्रचालन रहा हैं . raajaमहाराजा प्रसन होकर पुरस्कार दिया करते थे. आज पुरस्कारों का रूप बदल गया है , उनका प्रचालन नही बदला बल्कि उनकी संख्या और शेत्र बाद गए है . यह बात ये पर्मानित करती है की पुरस्कारों का परभाव दिनप्रतिदिन बढता जा रहा है. अब यह अलग बात है की समुन्द्र मंथन से किसी को अमृत मिलता है तो किसी को विष . अर्थात किसी को पुरस्कार मिलता है तो किसी को भ्रष्टाचार का अपमान.

भ्रष्टाचार विषबेल की तरह होता है . जो सिर्फ़ विनाश करता है———–सिर्फ़ विनाश .

भ्रष्टाचार व्यवस्था में व्याप्त हैं., भ्रस्ताचार सोच में व्याप्त हैं , इर्ष्या , द्वेष , और स्वार्थ में व्याप्त हैं. यदि शीघ्र ही इन भावनाओ पर नियंतरण किया गया तो निश्चय ही यह भ्रष्टाचार रुपी wishbale इन्हे भी अपने घेरे में लपेट लेंगी.

अभी ओलंपिक में हमें सिर्फ़ एक मैडल मिला . हम सभी को निराशा हुई क्योकि हम सभी इसके लिए पर्यास्रत थे . कही कुछ कमी रह गई. यदि भर्ष्टाचार से मैडल मिलते तो हमें अवश्य ही कुछ तो मैडल और मिल ही गए होते क्योकि भ्रष्टाचार में तो हमारा देश काफ़ी आगे हैं.

काश ऐसा होता तो हम भी कुछ और पुरस्कार पा जाते..