मैं नियति हूँ आप मुझे जानकर भी नही जानते इसलिए अपना परिचय देना आवश्यक है यथार्थ यह है कि कुछ को हम जानने के इच्छुक रहते हैं और किसी को जानकर भी नही जानना चाहते मैं उन्ही में से हूँ विडम्बना तो यह है कि मुझे हर बार ,हर युग में अचीन्हा गया ,लेकिन मैंने अपना अस्तित्व किसी न किसी रूप में बनाए ही रखा
सृष्टि के प्रारम्भ में मेरे अस्तित्व के बिना सृष्टि अधूरी थी हर तरफ नीरसता थी ,आलस्य था कोई आकर्षण न था ईश्वर ने मुझे बना कर सृष्टि के क्रम को आगे बढाया आदिकाल में श्रद्धा के रूप में मैंने त्याग ,बलिदान ,सहिष्णुता ,सहनशीलता ,प्रेम दया और ममता के भावों से सभी का परिचय कराया लेकिन आदि पुरूष मनु ने मुझे उस काल में भी अपने स्वार्थ की पूर्ति कर उपेक्षित किया ,मेरा तिरस्कार किया लेकिन मेरे अस्तित्व को मिटा न सका थक हार कर ,निराश हो कर वह मेरी ही शरण में आया मैंने उसे माफ़ कर खुले दिल से अपनाया ,मेरी इस सहृदयता को युग ने मुर्खता समझा ,उसका महत्तव न समझा अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए हमारी भवनों से खेलते रहे और धोखा दे कर हृदय हीन बनाने की कोशिश करते रहे लेकिन मैंने अपनी ममता ,स्नेह और मानवीय भावनाओं का स्रोत न सूखने दिया
सतयुग में सत्य के कारन अंहकार और स्वार्थ को स्थान न मिला इसलिए उस युग में सत्य के साथ मिलकर सर्व भुत हो गयी जैसे -जैसे काल चक्र आगे बढ़ता गया वैसे -वैसे मनुष्य अधिक स्वार्थी ,लालची .अहंकारी और शक्ति शाली होता गया जब शक्ति और सत्ता किसी के पास होती है तो वह कब अत्याचारी हो जाता है पता ही नही चलता यह शायद वह स्वं भी नही जान पता लेकिन अपनी शक्ति का प्रयोग करना वह कभी नही भूलता
त्रेतायुग में मुझे निरपराधी होने पर भी कभी सीता के रूप में अग्नि -परीक्षा देनी पडी ,कभी सुलोचना के रूप में सती होना पडा हार युग में हार परिक्षा में सफल होती रही क्योंकि इसका आधार त्याग और बलिदान रहा स्वार्थ नही रहा इसलिए विपरीत स्थिति में भी विजयश्री ने अपना बहुमूल्य हार मुझे ही पहनाया।
काल चक्र की गति के साथ साथ मेरी गति भी बदलती गयी द्वापर युग जिसे क्रिशनयुग कहना ही उपयुक्त होगा में ,यग्यसेनी छली गयी ,अपमानित की गयी यहाँ तक स्त्री जाती की मर्यादा को भी छन्न भिन्न किया गया यशस्वी पंच – पतियों के सामने मैं , द्रोपदी लाचार और अपमानित हुई इसका अनुम्मान यह काल भी नही लगा सकता इतिहास ने तो कुछ साक्ष्य ही दिखाए हैं उसने उस वेदना को ,उस आत्म ग्लानी को नही देखा न भुगता उसे मैंने भुगता है उसे मैंने तिल -तिल जिया है और जीने में न जाने कितनी बार मरी हूँ हर मौत और भी भयानक और भी क्रूर होती गयी इस अपमान ने ,इस टीसन ने ,इस वेदना ने मुझे इतना जलाया की यह जलन हिमालय की श्रंखलाओं के बीच हिम आक्षादित होकर भी शांत नही हुई क्या तुम्हे बर्फ से उठता हुआ धुंआ दिखाई नही देता ?देता है ….न ये मेरी आहें हैं ,ये मेरी पीड़ा है जो आज भी धधक रही है कुछ गलतियाँ क्षम्य होती हैं तो कुछ चाह कर भी इस परिधि में नही आती
इतना सब होने के बाद भी मैं हारी नही ,टूटी नही ,बिखरी नही ,मैं अस्तित्वहीन न हुई ,क्योंकि मेरा एक रूप था ,एक आकार था ,एक व्यक्तित्व था इसलिए अस्तित्ववान बनी रही
काल रथ का पहिया अब उस जगह आकर स्थिर हो गया है ,जहाँ कर्ण की मौत सुनिश्चित है एक सत्य की मौत ,एक विश्वाश की मौत यह काल चक्र कलियुग में आकर थम गया है अंहकार ,स्वार्थ ,लोभ ,काम ने इस काल को अपने आगोश में लेलिया है परिणाम …….स्पष्ट है कलीयुगी पुरूष ने अपनी ही सहचरी को ,अपनी ही शक्ति को ,अपनी ही प्रेरणा को शक्तिहीन करने का बीडा उठा लिया है अंहकार और शक्ति के मद ने उसे कामांध ही नही एसा अँधा बना दिया है जो अपने भले -बुरे को भी नही पहचान सकता
क्रूरता अपनी चरम सीमा पर है दया ममता ,कर्तव्य ,सच्चाई और ईमानदारी ने किनारा कर लिया है काली स्थान में अब सिर्फ़ शैतान का घर है इसने पढे -लिखे ,समझदार व्यक्ति को विज्ञान के उन अनुसंधानों की ओर धकेल दिया है जहाँ वह ईश्वर की सृष्टि में भी दखलंदाजी करने लगा है विज्ञानं ने गर्भस्थ शिशु के बारे में सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करा दी है जिससे पुरूष ने अपनी इच्छा को स्त्री पर लाड दिया है कभी वह स्वयं बेटा चाहता है तो कभी इस चाहत में माता और बहन को भी शामिल कर लेता है और भ्रूण हत्या जैसे अपराध में प्रवृत्त हो जाता है
इस कृत्य ने आज संसार को उस मोड़ पर लाकर खडा कर दिया है जहाँ से सृष्टि के रास्ते भी बंद हो जाते है न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी सदियों से कभी गला दबा कर ,कभी जहर देकर जो कन्याओं की ह्त्या की जाती थी आज वे निर्भीक तौर पर इसे की जाती हैं की न उन्हें कफ़न नसीव होता है न अंत्येष्टि आज उनकी अंत्येष्टि छोटे -छोटे टुकडों में काट कर नाली में बहा कर की जाती है कोई रोता नही ,बिलखता नही ,तडपता नही ,सब कुछ योजना बद्ध तरीके से होता है
पहले बालिका को जन्म लेने के बाद मारा जाता था आज उससे कोख में पलने का सुख भी छीन लिया उसकी जन्म दात्री जो सब पर ममता लुटाती है इसे मानव रुपी दानवों के दबाव से नही बचा पाती
पहले तो मैं सामना कर लेती थी ,जूझ लेती थी ,हरा देती थी ,झुकने को मजबूर कर देती थी क्योंकि उस समय मेरा रूप था आकार था बिना रूप और आकार के मैं कैसे लडूंगी ?अब तो मानव को मुझे इस जमीन पर लाने मेंभी हिचकिचाहट होने लगी है
याद रखिए बिना बाती के दीपक निष्प्राण एवं निरर्थक होता है उसे अस्तित्व में लाने के लिए बाती के अस्तित्व को स्वीकारना होगा अन्यथा वह दृष्टिहीन आखों की तरह व्यर्थ होगा मनुष्य मेरी नियति को बदलने की लाख कोशिश करले ,वह मुझे मिटा नही पायेगा उसे फ़िर मेरे पास आना ही होगा मैं भी बहुत जिद्दी हूँ ,हटीहूँ जिस तरह हर युग में अपने आप को बनाए रखने में समर्थ रही हूँ उसे कलियुग में भी मेरे अस्तित्व को स्वीकारना पडेगा मैं हार नही मानूगी हर बार नई कोख की तलाश में रहूंगी तुम मुझे मिटाते रहो मैं फ़िर आउंगी ……….मैं फ़िर जन्म लूंगी ………..मैं फ़िर जन्म लूंगी।