[ultimatemember form_id=12643]

दादा -दादी के किस्से

///दादा -दादी के किस्से

दादा -दादी के किस्से

दादा -दादी के किस्से

दादा -दादी के किस्से कितने रोचक और मन भावन होते थे कि आज भी उन्हें याद करके रोमांचित हो उठते हैं | सुनहरी ,रुपहली परियों की रहस्य से भारी कहानियाँ

तो कभी राजा -रानी के शौर्य -धैर्य से भरी कहानियाँ ,कभी तोता -मैना की काल्पनिक कहानियाँ बच्चों को एक अलग ही संसार में पहुँचा देती थी | जहाँ उनका अपना

काल्पनिक संसार होता ,अपनी सोच और धारणा होती | कोई भी बच्चा काले भूत और भयानक राक्षस को अपने जीवन में जगह नहीं देता क्योंकि बुरएयों से वह अपने

आप को बचा कर रखने का प्रयत्न बचपन से ही करने लगता |

सर्दियों के दिनों में दादा -दादी की रजाईयों में घुस कर बैठना भला किसे याद न होगा | गर्मियों में छतों पर ,आंगन में चौपाल पर चांदनी रातों में

सुंदर मन भावन कहानियाँ सुनना किसे न भाएगा |कभी ध्रुव तारे को देख कर उसकी कहानी सुनना ,कभी सप्त ऋषियों के बारे में जानना ,कभी शुक्र तारा और पुच्छल –

तारा देखना और उनकी कथा सुनना ,कितना रुचिकर और ज्ञान वर्धक होता था |

दादा -दादी का महत्व पूर्ण और महिमामंडित पद उन्हें कुछ विशेष उत्तरदायित्व प्रदान करता ,जिसे वे खुशी -खुशी निभाते थे | उनके संरक्षण में बच्चे कुशाग्र ,कल्पना शील

तथा कर्तव्य परायण हो जाते | कल्पना और कला का सुन्दर सामंजस्य उन्हें संवेदन शील और आदर्श व्यक्तित्व का धनी बना देता |

जैसे -जैसे दादा -दादी का महत्वपूर्ण पद ,महत्वहीन होता गया वैसे -वैसे उनके किस्से -कहानियां खतम होते गए | चित्र कथाओं , कोमिक्स , वीडियो गेम और टी.वी

के प्रचार ने बच्चों से उनके दादा -दादी को छीन लिया | उनकी ममता ,आशा का आंचल ,उनके सिर से हट गया | प्यार ,संवेदना ,अपनेपन के भाव को तिरोहित कर

दिया | इस भौतिक वादी युग ने मस्तिष्क को तो सक्रिय बना दिया लेकिन हृदय की कोमल भावनाओं को कुचल दिया | इसने मनुष्य का मशीनीकरण कर दिया ,

वह लाभ देख कर कार्य करता है , नैतिकता और मानवता से हट गया है |अब न उन्हें दादा -दादी में रूचि रही है और न उनके किस्से -कहानियों में |

महाभारत में कहा गया था —“वह सभा ,सभा नही होती जिसमें वृद्ध नहीं होते ” मेरे अनुसार वह घर ,घर नहीं होता जहाँ बुजुर्ग नहीं होते | पूर्व काल में वृद्धों के चेहरे

अगाध ज्ञान ,अनुभव और सम्मान से मंडित रहते थे | सुख और शांति की आभा रहती थी लेकिन आज उनके झुर्रियों भरेउदास  चेहरे और डबडबाई आँखे कुछ अलग

ही दास्ताँ सुनाती हैं | असुरक्षा की भावना ने उन्हें सबसे ज्यादा त्रस्त किया है क्योंकि आज उनके पास वे घर नही हैं जिनमें अपनेपन और स्नेह की दीवारें होती हैं,

त्याग और कुर्वानी का फर्श होता है |प्रेम और प्यार के झरोखे होते हैं ,इच्छा और अरमानों की छत होती है|ममता और मर्यादा की खिड़कियां होती हैं ,उमंग और उल्लास

के दरवाजे होते हैं |सतरंगी सपनों और जीवन के सम्पूर्ण रसों से भरे होते हैं |

ईंट और गारे की दीवारें तो जरा से झटके से भरभरा कर गिर जाती हैं लेकिन स्नेह और अपनेपन की दीवारों में तूफानों का सामना करने की मजबूती होती है |

विडम्बना तो यह है कि आज लोग घरों में नहीं मकानों में ,फ्लैटों में ,कोठियों में रहते हैं ,जहाँ अपनों के लिए जगह कम ही पडती है | अत: घर के बुजुर्गो को वृद्ध –

आश्रमों में शरण लेनी पडती है | कभी वे परिवार के माहौल से तंग आकर स्वयं ही इन आश्रमों में चले जाते है |कभी घर वाले ही उन्हें वहाँ जाने को मजबूर कर देते है|

अपने बच्चों की परवरिश के ख्याल से ,उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें कमरे देने पड़ते हैं और माँ -बाप को बेघर कर देते हैं | बच्चों की चिंता रहती है लेकिन स्वयं

जिनके बच्चे हैं उनकी चिंता नहीं होती |

कभी -कभी माता -पिता की संपत्ति को जल्दी प्राप्त करने के लिए उन्हें अकाल मृत्यु की गोद में सुला देते हैं | कभी थोड़ा धन देकर अपने कर्तव्य की

इतिश्री समझ लेते हैं | प्रवासी बच्चों को देखने के लिए आँखे तरसती रहती हैं लेकिन उन्हें समय ही नहीं मिलता | अच्छे -भले कमाऊ पुत्र भी माता -पिता को पाल

नहीं पाते |

कहीं गहरे यह धरना रहती है कि बुजुर्गों से पीछा छुटा ………लेकिन जरा विचार कीजिए इसकी कितनी बड़ी कीमत अदा की ……..बच्चों से उनके

दादा -दादी छीन कर |कितना सुख और संतोष मिलता है दोनों को एक साथ रह कर |बच्चे अकेलेपन ,भय और असुरक्षा की भावना से घिरे होने के कारण विभिन्न

मानसिक बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं | उनका बचपन नीरस और तनावपूर्ण हो जाता है ,उनका चारित्रिक और मानसिक विकाश नहीं हो पाता |

आज माता -पिता की आवश्यकता तभी तक महसूस होती है जब तक बच्चे छोटे होते हैं | बुजुर्ग या तो घरों में दिखते ही नहीं और कहीं दिखते हैं,

तो अपने बहू -बेटों के परिचितों को देखते ही अपने कमरे में बंद हो जाते हैं ,उन्हें डर रहता है  कि कहीं खाँसी का ज्वार और धुंधली आँखे कुछ कह न दे |

आज दादा -दादी के किस्से सुनने को नहीं मिलते क्योंकि वे स्वयं किस्सा बन गए हैं  ,जिन्हें आप हर घर में ,गली में ,नुक्कड़ में ,गांव में,शहर में

देख सकते हैं |

…………….

By | 2017-09-25T12:27:16+00:00 July 27th, 2011|Hindi Blog & Stories|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

Leave A Comment

Pin It on Pinterest

Share This

Share This

Share this post with your friends!