तराजू ———

जब भी मैं तराजू की कांपती डंडी को कभी इधर तो कभी उधर झुक कर संतुलन बनाते देखती हूँ तो मुझे हर उस नारी की याद आ जाती है जो अपना सम्पूर्ण जीवन  संतुलन बनाने में लगा देता है |इस संतुलन को बनाए रखने में उसे क्या -क्या सहना पड़ता है ,क्या क्या करना पड़ता है | कहने को तो “अज्ञेय जी ” ने कहा है — ” दो- दो मात्राएं लेकर है नर से भारी नारी ” पर सच यह है कि वह न भारी है न तराजू है बल्कि वह तो सिर्फ तराजू की डंडी है जो संतुलन बनाए रखने का कार्य  करती है |जिस दिन वह संतुलन बनाने के लायक नहीं रहती तो तराजू की ही तरह बेकार और अनुपयोगी हो जाती है | जब मैं छोटी थी , दादी की प्यारी थी | उनकी तरह सुन्दर थी {सब कहते है } जब कभी माँ और दादी में अनबन हो जाती ,तो उसे संतुलन बनाने के लिए उपयोग किया जाता | माँ यदि दादी से नाराज होती तो मुझे अकारण ही मारती ,सारा क्रोध मुझ पर निकालती | दादी जब माँ से नाराज होती तो मुझे  कहानी न सुनाती ,गोदी में न बिठाती ,पान न खिलाती | मैं दोनों में संतुलन डर -डर कर बना ही लेती | माता -पिता में कभी खटक जाती तो सारा काम मेरे सिर पर आ जाता क्योंकि माँ को सिर दर्द हो जाता और पिता को घर का काम आता न आता था | बनते -बिगाड़ते मुझे ही करना पड़ता | आर्थिक संकट होता तो भाई को प्राथमिकता मिलती ,मेरी पढाई पर कम खर्चा करने का निर्णय लिया जाता |संतुलन का आधार मैं बनती |धीरे -धीरे मैं इसकी अभ्यस्त होगयी |माता -पिता खुश कि बेटी समझदार हो गई तो उन्होंने उसे दो परिवारों में सम्बंध बनाने के लिए सेतु बना दिया | ससुराल और मायका दो ऐसे परिवार जो पांडवों और कौरवों की तरह लाख कोशिश करने के बाद भी एक नहीं हो सकते | उन्हें एक करने का जिम्मा मेरा था | मैं खुश होकर गलत बातों को मखमल का जामा पहना कर प्रस्तुत करती जिससे कुछ आकर्षण बना रहे | पिता के घर की मान -मर्यादा, सम्मान बनाए रखने के लिए झूठ भी बोलती , बातें भी बनाती ,सबको प्रसन्न करने का प्रयत्न करती | कभी ससुराल का मान रखने के लिए अपने ही घर में अपने ही लोगों को भ्रम में रखती ,संतुलन जो बनाना था | इस संतुलन को संभालते -संभालते जब  प्रोढ़ अवस्था में प्रवेश किया तो और भी जिम्मेदारी और मुश्किल संतुलन साधना पड़ा | वह संतुलन जो दो पीडियों के बीच का है | पिता और पुत्र में सामंजस्य बिठाना सबसे अधिक मुश्किल है | न पुत्र ,पिता की मजबूरियों और लाचारी को समझता  है | न पिता ,बच्चे की जरूरतों और समस्याओं को | कभी एक की नाराजगी सही ,तो दूसरे का क्रोध | आर्थिक दायित्वों को निभाने के लिए घर से बाहर कदम रखा | घर और आफिस में संतुलन बनाने के साथ -साथ सबकी शंकाओं का निवारण करना कितना मुश्किल है , यह भुक्त -भोगी ही समझ सकता है |धन अपने आराम के लिए शान शौकत के लिए सबको चहिए लेकिन किसी और के आराम के लिए कोई कुछ करने के लिए तैयार  नहीं दूसरों का ख्याल रखना सिर्फ गृहणी का ही दायित्व है | मुसकरा कर सौम्यता , विनम्रता और शिष्टता का अभिनय करते -करते अब हालत यह है कि किसी से शिकायत करते हैं या दुःख व्यक्त करते हैं तो कोई विश्वास  नहीं करता |  घर ,ग्रहणी ,परिवार ,समाज ,संबंधी सभी में संतुलन बनाते -बनाते जब जीवन -मृत्यु में संतुलन बनाने का समय आया तो मरते समय भी चेहरे पर मुसकराहट आ गई | लोग कहने लगे –” देखा ,मृत्यु की वेदना जरा भी चेहरे पर नहीं झलक रही ,कितनी शांति की मृत्यु पाई है | वे क्या जाने कि इस मुसकराहट के पीछे कितना अभ्यास छुपा है ,लेकिन खुशी है कि कहीं असंतुलन नहीं होने दिया | खुशी में ,गम में ,आशा में ,निराशा में , उल्लास में ,अवसाद में संतुलन बना कर जीवन को आगे बढ़ाती रही | समय के साथ तराजू में परिवर्तन आया ,उसका स्थान वेंइग  मशीन ने ले लिया |डंडी का कांपना बंद होगया ,पलडों का झुलना बंद हो गया |आशा है अब इस युग की महिलओं को भी संतुलन के लिए हर पल ,हर क्षण कांपना नहीं पड़ेगा ,बल्कि एक गौरवमय जीवन ,महिमामय अस्तित्व प्रदान करेगा |

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