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///काजल की खोज

काजल की खोज

मिस्टर लाल के घर के सामने जैसे ही एंबुलेंस आकर खड़ी हुई कि गली में हलचल मच गई । बच्चे, बूढ़े, जवान सभी जानने को उत्सुक थे कि – उनके यहाँ क्या हो गया ?

वैंकू ने घर आकर बताया कि लाल अंकल के घर एंबुलेंस आई है शायद लाल आंटी की तबीयत खराब है । मम्मी ने उदास होकर कहा –

“ जब से नन्ही काजल गायब हुई है तभी से उसकी माँ की तबियत खराब है ।

“ मम्मी बच्चे कैसे गायब हो जाते हैं ?” वैंकू ने परेशान होकर पूछा ।

“ बेटा बच्चे गायब नहीं होते ….. उन्हें गायब कर दिया जाता है , लोग इन बच्चों से भीख मँगवाते हैं, चोरी करवाते हैं या उन्हें जरूरत मंदो को बेच देते हैं।

“बच्चों को बेच देते हैं !” वैंकू ने आश्चर्य से पूछा

“ हाँ बेटा …. आजकल लोगों की सोच बहुत गिर गई है । वे थोड़े से रुपयों के लालच में पड़ कर कुछ भी कर डालते हैं । मम्मी ने उसे समझाया ।

“ लाल आंटी को सब लोग हस्पताल लेकर गए हैं” तनुष ने लगभग दौड़ते हुए घर में प्रवेश कराते हुए कहा ।

“ मुझे मालूम है , बेचारी क्या करें ….काजल के बिना उनका मन नहीं लगता” दुखी मन से वैंकू ने कहा

“ यार ! हम लोगों को कुछ करना चाहिए, काजल को ढूढ़ने के लिए ।

“ तुम सच कहते हो” वैंकू ने सहमति जताई । आशीष, रुहिन को साथ लेकर हम सब मोची अंकल के पास चलते हैं । वे ही हमें कुछ रास्ता दिखाएंगे ।

मोची अंकल को काजल के बारे में सुन कर बहुत दुख हुआ । वैंकू ने उन्हें बताया कि जब लाल आंटी काजल को साथ लेकर अपनी बीमार माँ को देखने जा रही थीं तभी स्टेशन से पता नहीं कैसे काजल गायब हो गई । सबने बहुत ढूंढा लेकिन उसका कुछ पता नहीं लगा । पुलिस को भी बताया लेकिन वे लोग भी कुछ नहीं कर पाए ।

मोची अंकल ने उन्हें समझाया कि इस बार तुम्हारा दुश्मन कौन है और कहाँ है ये नहीं मालूम इसलिए बहुत होशियारी से कम करना होगा । मोची अंकल ने बच्चों को ऐसे जूते दिए जिन्हें पहन कर वे अदृश्य भी हो सकते थे । उन्हें कोई न देख सके , वे सबको देख सकते थे । बच्चों ने अपना कार्य अगले दिन से ही करने का निश्चय किया । उन्हों ने मोची अंकल से आशीर्वाद लिया और अपने – अपने जूते लेकर चल दिए।

बच्चों ने अगले दिन जम्मू स्टेशन से “जम्मू तवी” से  रेल का सफर शुरू किया और संदिग्ध लोगों पर नज़र रखने का निश्चय किया , उचित समय पर वे अपने जूतों का प्रयोग करेंगे ।वे दो- दो के समूह में अलग – अलग डिब्बों में बैठ गए । सभी बच्चे सफर के नाम से ही उत्साहित थे , उन्हें रेल से यात्रा किए हुए बहुत समय हो गया था । अपने मिशन को ध्यान में रख कर वे मस्ती करने लगे ।

दस – पंद्रह मिनट तक तो लोगों का आवागमन इस तरह लगा रहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आज सभी लोग यात्रा पर निकले हैं । जब लोगों ने अपना – अपना सामान लगा लिया तब सबने चैन की सांस ली फिर एक दूसरे की ओर प्यार से देखा । मुसकराहट के आदान – प्रदान ने माहौल को हल्का बना दिया ।

मुस्कराहट भी क्या अद्भुत वरदान है ईश्वर का , एक हल्की सी मुस्कराहट कब किसे अपना बना ले पता ही नहीं चलता । संसार में ऐसा कौन होगा जो एक शिशु की मुस्कराहट पर मुग्ध न होता हो, चेहरे पर छाई उदासीनता और चिंता भी पल भर में गायब हो जाती है । कहते हैं अच्छे स्वस्थ्य के लिए मुसकराना दावा का कार्य करता है । “ खुश रहिए – मस्त रहिए – स्वस्थ रहिए” आज के समय का यह महा मंत्र है ।

बच्चे जल्दी ही सबसे घुल – मिल गए । दिन ज्यों –ज्यों चढ़ रहा था फेरी वालों के चक्कर भी शुरू हो रहे थे । कोई चटपटा चना बेच रहा था तो कोई भुनी मूँगफली ,कोई उबले अंडे लेकर घूम रहा था तो कोई लाजवाब भेलपूरी । बच्चों को भी बहुत मजा आ रहा था । पिछले डिब्बे से (कम्पार्टमेंट )मधुर गाने की आवाज आ रही थी । वैंकू ने आशीष से कहा –“ कितनी मधुर आवाज है !”

“ आवाज ही नहीं सुर भी कितना सधा हुआ है । दोनों उसका धैर्य से इंतजार करने लगे । कुछ ही देर में एक बीस बाईस साल का युवक एक आठ साल के बच्चे का हाथ थाम  कर वहाँ आ गया ।उसके हाथ में रेल की पटरियों के किनारे पड़े पत्थरों के दो टुकड़े थे जिन्हें वह इतना सुंदर बाजा रहा था कि उसके गाने के साथ किसी भी वाद्य यंत्र की आवश्यकता नहीं थी । इस हुनर की क्या तारीफ करें । सहज विश्वास ही नहीं होता कि इन पत्थरों से भी इतनी सुरीली आवाज निकल सकती है !यदि व्यक्ति कलाकार हो तो कुछ भी कर सकता है । उस नेत्र हीन व्यक्ति ने एक दो फिल्मी गाने भी सुनाए । सभी मंत्र मुग्ध हो गए । जोरदार तालियों से लोगों ने उसका उत्साह वर्धन किया और उसकी झोली में अपना सहयोग उड़ेल दिया यूं तो किसी भी काला की कोई कीमत नहीं होती लेकिन जीविका के लिए धन आवश्यक है ।

कुछ ही देर में एक छोटा बच्चा और उससे थोड़ी बड़ी एक लड़की आ गई । एक छोटी सी रिंग में से निकलने  के विभिन्न करतब दिखने लगे । इतनी कम जगह में वे कैसे – कैसे करतब दिखा रहे थे कि देखने वाले भी हैरान रह जाएँ ।

भारत में रेलों  का जाल सा बिछा है । यह सरकार का सबसे बड़ा विभाग है । हमारे शरीर में जिस प्रकार धमनियाँ हैं उसी प्रकार यात्रियों को लाने और जाने के लिए रेलें हैं । यातायात का यह सबसे सुलभ और सरल साधन है ।

शाम होने वाली थी एक स्टेशन पर रेल रुकी तो तनुष और रुहिन भी उनसे मिलने आ गए । तनुष ने बताया कि एक व्यक्ति रुहिन को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहा था । कभी वह खाने की कुछ चीजें खरीद कर देने की कोशिश कर रहा है तो कभी चौकलेट देने की । रुहिन दर गई उसने उससे कुछ भी लेना स्वीकार नहीं किया । वैंकू और आशीष ने उसे प्यार से समझाया कि अब तो रात होने वाली है हम अपने जादुई जूतों की मदद से अदृश्य होकर उनका पीछा करेंगे । रुहिन से सबने कहा कि तुम उनका साथ दो ,हम सब तुम्हारे साथ रहेंगे, लेकिन तुम हमें नहीं देख सकोगी हम सब तुम पर नज़र रखेंगे । रुहिन सबके आश्वासन से यह कार्य करने को राजी हो गई । उसके पास जादुई जूते भी थे जिनका नीला बटन दबाते ही वह उनकी नज़र से ओझल हो सकती थी । वह खुश थी कि वह एक बड़ा कम करने जा रही है ।

सभी बच्चे अपने स्थान पर आ गए और अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगे । रुहिन जब अपने स्थान पर गई तो डरी हुई नहीं थी, एक आत्म विश्वास स भारी थी । वह व्यक्ति उससे कुछ खाने का आग्रह करने लगा । रुहिन ने ले लिया और मुसकरा कर उससे बातें करने लगी । उस अजनवी ने पूछा – “तुम कहाँ जा रही हो ?”

“ पता नहीं …. मैं अपनी मम्मी को ढूंढ ने जा रही हूँ , वह कई दिनों से मिल नहीं रही” उसने मासूमियत से कहा

“ तुम अकेली यह कार्य करोगी !”वह आश्चर्य से बोला

“ हाँ … मैं तो अकेली हूँ …”

“ मैं तुम्हारी सहायता करूँ …. तुम मेरे साथ चलो”

“ अच्छा ….रुहिन ने हिम्मत से हामी भरी

“ तुम्हारे साथ और कौन – कौन है ?”रुहिन ने पूछा

“मेरे पास तुम्हारे जैसे कई बच्चे हैं …..तुम्हें वहाँ अच्छा लगेगा”

“ मैं वहाँ खेल भी सकूँगी ….”रुहिन ने उसे अपनी भोली बातों में उलझाया ।

तनुष ने दोनों की फोटो अपने मोबाइल में कैद कर ली वह दूर से  उस पर नज़र रखे हुए था । उसने रुहिन को उसके साथ जाने का इशारा किया ।

अगले ही स्टेशन पर वह रुहिन को लेकर उतर गया । तनुष के इशारे पर वैंकू और आशीष ने उसका पीछा किया । तनुष भी कुछ दूरी पर चल रहा था । रात्रि के आगमन ने उन्हें थोडा सतर्क बना दिया था । उनहों ने अपने जूतों का नीला बटन दबाया और अदृश्य रूप से रुहिन के साथ चल पड़े । सभी शांत और विस्मित थे । वह रुहिन को औटो में बैठा कर गलियों से सड़कों पर और फिर तंग गलियों से गुजरता हुआ ऐसे स्थान पर पहुंचा जो अंधेरे में डूबा था । वहाँ “बाल सुधार गृह” का बोर्ड लगा था । रुहिन ने डरते हुए उससे पूछा –

“ ये आप मुझे यहाँ क्यों ले आए ….”

“ अब यही तुम्हारा घर है । यहाँ तुम्हारे जैसे बहुत से बच्चे रहते हैं” उसने हँसते हुए कहा

“आपने तो कहा था कि आप अपने घर ले जाओगे”उसने रोते हुए कहा

“ यही मेरा घर है और आगे से तेरा भी ….यहाँ के बच्चे बड़े हुनर मंद है” वह फिर ज़ोर से हंसा

रुहिन का हाथ पकड़ कर वैंकू ने उसे साहस बँधाया और आगे बढ़ाने को कहा । तनुष तब तक पुलिस की खोज में जा चुका था । आशीष अंदर का जायजा ले रहा था ।

अंदर का माहौल बाहर से अलग था । अंदर बच्चे उछल कूद कर रहे थे । एक दूसरे से गाली -गलौज कर रहे थे । वे बड़े शातिर और बदमाश प्रवृत्ति के थे । कुछ जेब काटने का कार्य कराते थे तो कुछ लूट पाट का । तनुष के साथ आए पुलिस वालों ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया । तभी रुहिन ने बताया कि कुछ लड़कियो  को एक कमरे में भूखा –प्यासा बंद करके रखा है । रुहिन के बताने पर कैद लड़कियों को छुड़ाया गया । पुलिस को पता लगा कि यह झूठा बाल सुधार गृह है जहां अपहरण और छोरेए करके बच्चे लाए जाते हैं और उनसे गलत कार्य कराए जाते हैं । पुलिस और बच्चों की मदद से जब यह कार्य चल रहा था तभी एक छोटी सी बच्ची ने वैंकू का हाथ पकड़ कर कहा –

“वैंकू भैया आप मुझे अपने साथ ले चलो, मुझे मम्मी के पास जाना है ।

वैंकू उसे पहचान न सका उसने पूछा –

“तुम मुझे कैसे जानती हो ?”

“भैया ! मैं काजल हूँ ….”

बिखरे बाल ,निस्तेज चेहरा ,कमजोर शरीर ….वैंकू को विश्वास ही न हो सका कि यह काजल ही है । वैंकू ने उसे गोदी में उठा लिया ।

वैंकू और उसकी टीम की पुलिस वाले प्रशंसा कर रहे थे कि वे इन लोगों को नहीं पकड़ पाए । दूर से आए बच्चों ने कर दिखाया ।

हँसते हुए वैंकू ने कहा –“इसी को कहते हैं दीपक तले अंधेरा” और सब हंस पड़े ।

शब्द – अर्थ

आवागमन – आना और जाना

आश्वासन – तसल्ली देना

करतब – कलाएं

By | 2018-09-10T12:59:01+00:00 September 3rd, 2018|Jadui Joote|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.
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