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///जादुई जूते (मिशन 4 )

जादुई जूते (मिशन 4 )

सावन का महीना प्रारम्भ होते ही चारों ओर बम – भोले का प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगता है । कांवड़ियों को उठाने वालों का तांता शुरू हो जाता है । अमरनाथ की यात्रा की साल भर से तैयारी करने लोग जत्थों में कश्मीर के रास्ते पर चल पड़ते हैं । कुछ पंच तरणी का रास्ता अपनाते हैं तो कुछ सेना से घिरी वाल्टाल की चोटियों का रास्ता उचित समझते हैं । ऊंचे – ऊंचे पहाड़ों में विराजमान भगवान शिव शंकर की गूंज सब जगह सुनाई देने लगती है । सोमवार को विशेष अर्चना करने वाले भी बहुत होते हैं, तो सावन के पवित्र महीने का लाभ उठाने वाले भी बहुत होते हैं । बाबा अमरनाथ की यात्रा करने वाले भी बहुत होते हैं क्योंकि इस महीने में इस यात्रा का विशेष महत्व होता है । सर्दियों में बाबा बर्फानी अपने पूर्ण रूप में विराजमान होकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं । सावन मास की पूर्णिमा को यानी रक्षाबंधन वाला दिन इस यात्रा का अंतिम दिन होता है । उसके बाद बाबा अंतर्ध्यान हो जाते हैं । भक्त जनों को पुन: एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है ।

पहाड़ों की हसीन वादियों का प्रभाव कहिए या मौसम का खुशनुमा माहौल और भगवान शिव की अनुकंपा भी हो तो सोने में सुहागा हो जाता है । बम भोले के नाम में ही भक्ति का नशा है । नाम जपते ही व्यक्ति ही नहीं सारा माहौल ही भक्ति के नशे में चूर हो जाता है । अमरनाथ की यात्रा में लोग भक्ति की शक्ति का आनंद लेने के साथ पर्वतों की ठंडी, प्रदूषण रहित हवा का भी भरपूर मजा लेते हैं । कहा गया है कि कश्मीर की हंसी वादियों में साक्षात स्वर्ग है । “ यदि कहीं पृथ्वी पर स्वर्ग है तो वह यहीं है,  यहीं है, यहीं है”।

कुछ लोगों को सुंदर और शांतिपूर्ण जीवन रास नहीं आता । वे सदैव उसमें अशांति फैलाने के लिए तत्पर रहते हैं । हुआ भी यही …… जब से अमरनाथ की यात्रा शुरू हुई तब से आए दिन आतंक वादियों की संदिग्ध गतिविधियां लगातार पकड़ी जा रही थीं । लगता था जैसे इस बार वे अमरनाथ की यात्रा को सफलता पूर्वक पूर्ण नहीं होने देंगे । सेना और सुरक्षा बल पूर्ण सतर्कता के साथ कार्य कर रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं छुटपुट घटनाएँ हो ही जाती थीं । उसका मुख्य कारण  था, वहाँ के निवासियों के आतंक वादियों से संबंध । कभी – कभी वे भय के कारण उनका साथ देते थे, कभी लालच में आकर, कभी अपने संबंधी होने के कारण, नतीजा …. देश पर आतंकवादियों का बढ़ता प्रभाव …. जो न देश के लिए हितकर था न वहाँ की जनता के लिए ।

आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच आँख मिचौनी का खेल चल ही रहा था कि पता लगा कि वाल्टाल के आगे करीब दो किलो मीटर की दूरी पर आतंक वादियों ने न सिर्फ तीर्थ यात्रियों पर आक्रमण किया बल्कि कुछ तीर्थ यात्रियों को बंधक भी बना लिया । सभी को इन बंधकों को सुरक्षित बचाने की चिंता थी । आतंक वादियों पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही घातक हो सकती है । अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की सर्वत्र निंदा हो रही है । वैंकू और उसकी टीम अपनी तरह से तैयारी में जूटे हैं कि किस तरह इन बंधकों को बचाया जाए ।

वैंकू, तनुष, रुहिन और आशीष ने अपने – अपने जादुई जूते निकाले और गरम कपड़े पहने तथा जरूरी सामान अपने बैग में रखा और वे अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्लानिंग करने लगे । सभी ने निश्चित किया कि यह काम शाम होते ही प्रारम्भ कर देना है क्योंकि पहाड़ों में तो शाम और भी जल्दी हो जाती है । इधर सुरक्षा बलों और सेना के प्रमुख अधिकारियों में मंत्रणा चल रही थी और दूसरी ओर वैंकू की रेस्कू टीम तैयार थी

शाम ढलते ही बच्चों ने जादुई जूते पहने और अपने मोची अंकल का आशीर्वाद लिया । अंकल ने उन्हें तो आशीर्वाद दिया ही साथ ही उन्हों ने बंधक यात्रियों की जान की सलामती के लिए भी दुआ मांगी । बच्चों को अंकल ने अपने हाथ से बनाई चौकलेट खिलाई और उन्हें मिशन के लिए विदा किया । वैंकू और तनुष उस जगह से थोड़ा सा परिचित भी थे क्योंकि वे दो साल पहले अपने माता – पिता के साथ श्री नगर होते हुए वाल्टाल आए थे और उन्होने भी भोले नाथ के दर्शन किए थे । दर्शन करके उन्हें अद्भुत एहसास हुआ था, एक नई शक्ति का संचार होता हुआ उन्हें महसूस हुआ था । वे थक गए थे, वापस जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन दर्शन करते ही वे फिर शक्ति से भर गए और आराम से वापस आ गए थे ।

“काश ! उस समय जादुई जूते होते तो कितना मजा आता” तनुष ने कहा

“ क्या मजा आता !” रुहिन ने चेताया

“ इनका प्रयोग हम अपने हित के लिए नहीं कर सकते”

“ हाँ …हाँ … वैंकू तुम जरूर कुछ गड़बड़ करा देते आशीष ने हँसते हुए कहा

“ चलो जब भी मिले हैं, ये जादुई जूते …. इनका सही उपयोग करो” रुहिन ने उठते हुए कहा

“ चलो …. अब समय हो गया” सब एक साथ खड़े हो गए

जैनी पूंछ हिला रही थी …. सबने सोचा आज जैनी को नहीं ले चलते …. कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए,  लेकिन जैनी की जिज्ञासा और चंचल आँखों को देख कर रुहिन ने उसे भी जूते पहना दिए । बच्चे जल्दी ही उड़ते हुए वाल्टाल की पहाड़ियों में विचरण करने लगे ।

वाल्टाल की पहाड़ियों की ये विशेषता है कि ये मिट्टी और पत्थरों से बने ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे किसी विशालकाय इमारत के खंडहर हों । ऊंचे –ऊंचे पहाड़ों पर चमकते पत्थर जो मिट्टी के कारण पुराने और किनारों से टूटे हुए प्रतीत होते हैं । दिन में ये पहाड़ आकर्षण का केंद्र होते हैं । इनकी तलहटी से बहता हुआ कल –कल करता पानी मन को मोह लेता है । पहाड़ों की ऊंचाई से गिरता हुआ पानी दूध जैसा प्रतीत होता है, यह अद्भुत दृश्य होता है । यह अनवरत जल सदियों से ऐसे ही बहता रहा होगा । पानी की अविरल गति जल की सात्विकता और महत्व को दर्शाती है,  लेकिन यही दृश्य रात्रि के अंधकार में विशालकाय पिशाच से प्रतीत होते हैं । लगता है जैसे वह अपनी लंबी –लंबी बाहें फैला कर वह सबको अपने बाहु पाश में बांध लेगा, जिससे निकलना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा ।

बच्चे पहले तो तेज हवाओं और पानी के निनाद से दर गए फिर अपने दृढ़ निश्चय से आगे बढ़े । वैंकू,  रुहिन, तनुष आशीष सब अलग –अलग दिशाओं में घूमने लगे जिससे कुछ सुराग मिल सके । उन्हों ने अपने जूतों की लाइट बंद कर दी थी जिससे किसी को शक न हो । घाटियों में उन्हें कुछ न दिखा लेकिन एक जगह पत्थरों का अंबार दिखा …. वहाँ कुछ हलचल होती दिखी । रुहिन ने इशारा किया और सभी बच्चे उसके आस – पास आ गए ।

उन्हों ने देखा कि सात लोगों को हाथ – पैर बांध कर जानवरों की तरह दल रखा है, उनके मुंह में भी कपड़ा ठूँसा हुआ है । वहाँ कोई उनको देखने वाला न दिखा । जैनी ने सबसे पहले उस पहाड़ी के आस- पास चक्कर लगाया और थोड़ी ही देर में वैंकू के पास आकर खड़ी हो गई और उसकी ओर देखने लगी जैसे कह रही हो कि कोई खतरा नहीं है । बच्चों ने जल्दी से उनके हाथ – पैर खोले और मुंह से कपड़ा निकाला । सारे लोग बच्चों से लिपट गए । बच्चों ने उन्हें तसल्ली दी और शांत रहने के लिए कहा । रुहिन ने तब तक अपने बैग से बिस्किट के पैकिट निकाले और उन्हे खाने के लिए दिए । सभी बहुत भूखे थे । सभी निकलने की तैयारी में थे कि एक सनसनाती गोली वहाँ से निकली । पलक झपकते ही सब जमीन पर लेट गए । जैनी रुहिन का पैर पकड़ कर नीचे की ओर खींचने लगी । रुहिन खिसकती हुई नीचे फिसल गई उसने हाथ बढ़ा कर एक आदमी को पकड़ लिया जादुई जूतों की वजह से वह घाटी में उतार गई । गहन अंधकार था । जैनी ने अब तनुष को खीचना शुरू किया,  वह भी दो लोगों को अपने शरीर के साथ बांध कर नीचे खिसक गया और घाटी में छिप गया ।वैंकू और तनुष ने भी ऐसा ही किया । इसी बीच ज़ोर दार गोलियां चलाने लगी ।

गोलियों की बौछार के बीच सबने घाटी में ही छुपे रहने का निश्चय किया । वे पहाड़ से चिपके वहीं छुपे रहे । छोटी सी गलती भी बहुत बड़ा नुकसान कर सकती थी । गोलियां ऐसी चल रही थीं जैसे सैकड़ों बंदूकें एक साथ चल रही हों । जैनी पहाड़ का सहारा लेती हुई दूर निकल गई । कुछ समय बाद जब वह वापस आई तो उसकी चाल में तेजी और आँखों मे चमक थी । सब उसके साथ पहाड़ के किनारे खिसकते हुए चल रहे थे । लगभग एक घंटे तक ऐसे ही चलना पड़ा । फिर वे एक पहाड़ की ढलान पर आ गए । यह सुरक्षित स्थान था । सबने एक गहरी चैन की सांस ली । सब जादुई जूतों की सहायता से उड़ते हुए श्री नगर के लाल चौक पर आ कर रुके । वहाँ सुरक्षा बलों और सेना का कडा पहरा था । जब सबने बंधकों को सुरक्षित देखा तो खुशी का ठिकाना न रहा ।

सैनिकों ने वैंकू, तनुष, रुहिन और आशीष को गोदी में उठा लिया । दो सैनिक तो जैनी को भी उठा कर नाचने लगे । बंधक बने लोगों की आँखों में आँसू थे । सब बच्चों का शुक्रिया कर रहे थे । बच्चों ने कहा सब बाबा बर्फानी की कृपा है । सारे एक साथ बोलो –

“ बाबा बर्फानी की”

“ जय” संवेत स्वर से घाटी गूंज उठी ।

शब्द – अर्थ

अंजाम – परिणाम

सात्विकता – पवित्रता

छुट –पुट – छोटी मोटी

By | 2018-09-07T08:43:49+00:00 September 3rd, 2018|Jadui Joote|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.
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