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कबीर {जीवन परिचय }

///कबीर {जीवन परिचय }

कबीर {जीवन परिचय }

कबीर का जन्म वाराणसी  {उत्तर प्रदेश } के पास लहरतारा नामक स्थान मेंसन १३९८ में हुआ था | कहा जाता है वे एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे | लोक लाज के भय से

उसने इन्हें एक तालाब के किनारे फेंक दिया था | नीरू और नीमा नामक जुलाहे दम्पत्ति ने इनका पालन -पोषण किया | कबीर की रचनाओं में जुलाहे के कार्य से

सम्बंधित शब्दों का प्रयोग भरपूर हुआ है —“चदरिया झीनी रे झीनी |…..ताना-बाना ,रंग रंगरेज ,सूत ,कपास आदि शब्द मिलते हैं | कबीर की शिक्षा विधिवत नहीँ हुई |

उन्होंने कहा है–  “मसि -कागज छुओ नहीँ ,कलम गही नहिं हाथ |”उन्होंने देशाटन और सत्संग  ज्ञान प्राप्त किया |किताबी ज्ञान के स्थान पर आँखों देखे सत्य और

अनुभव को प्रमुखता दी |उनकी रचनाओं में नाथो ,सिद्धों और सूफी संतो की बातों का प्रभाव मिलता है| कबीरने  कहा है —————

मैं कहता हूँ आँखिन देखी ,तू कहता कागज की लेखी ”

वे कर्म कांड और वेद -विचार के विरोधी थे |जाति भेद ,वर्ण -भेद तथा सम्प्रदाय -भेद के स्थान पर प्रेम ,सदभाव और समानता का समर्थन करते थे |

कबीर ने स्वम कोई पुस्तक {रचना } नहीं लिखी | उनके  अनुयायियों ने उनके द्वारा बोले गए वचनों को लिखा | वे बीजक ,साखी, सबद ,पद रमैनी आदि के रूप में पाए

जाते हैं | कबीर एक महान योगी थे इसलिए उनकी रचनाओं में भरपूर रहस्यवाद पाया जाता है | इस तरह की रचनाओं में उनकी उलट वासियाँ प्रसिद्ध हैं |

कबीर ,साधु संतो के साथ घूमते -फिरते रहे अत: उनकी भाषा में अनेक भाषाओं के शब्द पाए जाते हैं |उनकी भाषा “सधुंकडी ” और” पंच मेल खिचड़ी ”

कहलाई |इसमें अवधी भाषा ,ब्रज भाषा ,उर्दू ,फ़ारसी ,पंजाबी ,राजस्थानी आदि भाषाओं के शब्द मिलते हैं | कबीर दास जी अपनी बात को कहने में पूर्ण समर्थ थे |

कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई है | उनकी भाषा में वह तासीर है कि व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता |

जहाँ प्यारे से {ईश्वर }एक क्षण का भी बिछोह नहीं ,वहाँ तडपन कैसी ?जो गगरी भरी है ,उसमें छलक कहाँ ? जहाँ द्वैत भावना ही मिट गई हो उस अजब मस्ती में

बेचैनी कहाँ ?  ….इस प्रेम में मादकता नहीं पर मस्ती है |कर्कशता नहीं पर मस्ती है ,असंयम नहीं पर मौज है | उच्छृखलता नहीं स्वाधीनता है | अंधा अनुकरण नहीं

पर विश्वास है |उज्जडता  नहीं पर अखंडता है | इसकी प्रचंडता सरलता का परिणाम नहीं विश्वास का फल है |तीव्रता आत्मानुभूति का परिणाम है, जो वज्र से भी

कठोर है पर कुसुम से भी कोमल है |

भाषा ,भावों की संवाहक होती है |कबीर की भाषा वही है | वे अपनी बात को साफ़ एवं दो टूक शब्दों में कह देने के हिमायती थे ,बन पड़े तो सीधे –

सीधे नहीं तो दरेरा दे कर | इसलिए  श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें वाणी का डिक्टेटर कहा है |

कबीर ने सन १५१८ में बस्ती के निकट मगहर में शरीर त्याग किया | किंवदन्ती है कि कबीर की मृत्यु उपरांत उनके अंतिम संस्कार के लिए हिंदू और मुसलमानों में

लड़ाई होने लगी |हिंदू कहते कि हम जलाएंगे मुसलमान कहते हम दफनाएंगे |दोनों में लड़ाई चल रही थी कि उनके शव से कपडा उड़ गया ,लोग हैरान रह गए जब उनके

शव के स्थान पर फूलोँ को देखा | उन्होंने आजीवन दोनों को एक करने की कोशिश की ,जो मृत्यु पर्यन्त भी निभाई |

By | 2017-09-25T12:29:16+00:00 July 16th, 2011|Hindi Blog & Stories|9 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.
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