[ultimatemember form_id=12643]

कबीर की गुरु और साधु के बारे में विचार

///कबीर की गुरु और साधु के बारे में विचार

कबीर की गुरु और साधु के बारे में विचार

कबीर ने गुरु को विशेष महत्व दिया है उन्होंने कहा है——

“गुरु -गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पायं  ,

बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय ||

गुरु ही गोविन्द को जानने और प्राप्त करने का रास्ता बताता है | गुरु ही सत्य का ,ज्ञान का सदमार्ग दिखाता है अत: उसका स्थान गोविन्द से भी ऊँचा है |

कबीर गुरु के बारे में कहते हैं ———–

“गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है , गढ़ी गढ़ी काढे खोट ,

अंतर हाथ पसारी के, बाहर मारे चोट  ||

गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य घड़े के जैसा है |जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाते समय उसके अंदर हाथ फैला कर उसे चिकना बनाता है |

ऊपर से उस पर चोट करता है | घड़े को सुन्दर आकार देने के लिए उस पर चोट करना आवश्यक है उसी प्रकार शिष्य को सुमार्ग पर चलाने के लिए

सख्ती करना आवश्यक है |

गुरु की महिमा का गान करते हुए उन्होंने कहा है ——–

“सब धरती कागद करूं ,लेखनि सब बनिराय  ,

सात समुद्र की मसि करूं ,गुरु गुण लिखा न जाय ||

गुरु की महिमा का गुण गान तो सारी धरती को कागज बना कर ,सभी वनों के वृक्षों की कलम बना कर ,सात समुद्र की स्याही बना कर भी नहीं

किया जा सकता | अर्थात गुरु की कृपा को तो शब्दों में कहना संभव ही नहीं है |

कबीर दास जी ने सत्संग को जीवन के लिए आवश्यक माना है |उन्होंने साधुओं का साथ ऐसे माना है कि यदि आप कुछ सीखना भी न चाहें तो भी वह अपना

प्रभाव दिखा देगी —–

” कबिरा संगत साधु की ज्यों गंधी का वास ,

जो कछु गंधी देहि नहिं तो भी वास ,सुवास ||

साधु की संगति इत्र बेचने वाले के समान होती है | इत्र वाले से कुछ भी मत खरीदिए फिर भी खुशबू तो आप स्वत:ही प्राप्त कर लेगे | उसी प्रकार सत्संग

से आप खुद व् खुद प्रभावित हो जाएंगे |

साधु के गुण बताते हुए उन्होंने कहा है ——–

” साधू  ऐसा चाहिए जैसा सूप स्वभाव ,

सार – सार को गहि रहे थोथा देहि उडाय |

सच्चा साधु वही है जो तत्व की बात को ग्रहण करे और व्यर्थ की बातों को ध्यान में न लाए ,जिस प्रकार सूप {अन्न साफ़ करने का बर्तन } अच्छा

अन्न तो अपने अंदर रखता है व्यर्थ {थोथा } को उड़ा देता है |

यदि कोई व्यक्ति समर्थवान हो कर भी किसी की सहायता नही करता तो उसका होना न होना एक समान है ————-

” बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर ,

पंथी को छाया नहीं फल लागें अति दूर ||”

साधु की पहचान ज्ञान से करनी चाहिए ,जाति से नहीं ———

” जाति न पूछो साधु की ,पूछ लीजिए ज्ञान |”

कबीर तो ऐसे व्यक्ति थे जो एक अच्छा समाज चाहते थे ,जहाँ सब मिल जुल कर रहें |कोई भेद -भाव न हो | वे अपना मत  भी स्पष्ट कर देते हैं —-

” कबिरा खड़ा बाजार में ,मांगे सबकी खैर ,

ना काहू से दोश्ती ना काहू से बैर  ||

By | 2017-09-25T12:29:28+00:00 July 16th, 2011|Hindi Blog & Stories|0 Comments

About the Author:

Kalpana Dubey is a Passionate teacher of Hindi Literature for the last 20 years. She is dedicated to sharing the richness of hindi language and Indian culture to ignite young minds with potent knowledge and perspectives. She has written 3 books on Hindi Grammar used in the CBSE curriculum, and published 2 collections of short stories Kushboo; and Jarokha. Those who know her would agree that, to listen to her, is to experience a spell.

Leave A Comment

Pin It on Pinterest

Share This

Share This

Share this post with your friends!