कबीर निर्गुण ब्रह्म को मानने वाले ज्ञान मार्गी शाखा के भक्त कवि थे | वे राम को अपना आराध्य मानते थे | उनके राम दशरथ पुत्र राम नही थे | उन्होंने कहा —

“दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना , राम नाम का मरम न जाना |”

उनके राम अनादि ,अनन्त ,सर्व कालिक ,सर्वत्र व्याप्त रहने वाले थे | वे हर जीव धारी में निवास करने वाले हैं | हर एक के शरीर में निवास करते हैं |उन्होंने कहा —

” स्वांस -स्वांस  में हरि भजो , व्यथा स्वांस मत खोय |

ना जाने इस स्वांस का आवन होय न होय ||”

वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे | वे ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आत्म ज्ञान पर बल देते थे |उन्होंने कहा था ————-

१    “मोकों कहाँ ढूढें रे वंदे ,मैं तो तेरे पास में”

२   “आत्म ज्ञान बिना सब सूना ,क्या मथुरा क्या काशी |”

उन्होंने ईश्वर के बारे में कहा है ——-

” कस्तूरी कुंडल बसें मृग ढूढें वन माहि

ऐसे घट घट राम है दुनियां जाने नाहि |”

जिस प्रकार कस्तूरी मृग की नाभि में कस्तूरी होती है | वह उसकी खुशबू को सरे जंगल में ढूढता फिरता है ,उसी प्रकार ईश्वर मनुष्य के अंतर में

छिपा रहता है |

उन्होंने ईश्वर को अदृश्य ,अगोचर माना है

१   “ज्यों तिल माही तेल है, ज्यों चकमक में आग .,

तेरा साई तुझ में, जान सके तो जानि  ||”

२ “साहब तेरी साहबी घट -घट रही समाय

ज्यों मेहदी के पात में ,लाली लखी न जाय |”

कबीर  ने बाह्य आडम्बरो का विरोध किया है | उन्होंने हिंदू -मुसलमान दोनों के बाह्य दिखावे का विरोध किया है | आत्म ज्ञान पर बल दिया है | प्रेम ,सदभाव

परोपकार ,दया आदि पर बल दिया है | वे कर्म करना आवश्यक मानते है | वे चाहते हैं कि जिसके पास धन -दौलत है ,वह समाज के उस वर्ग की सहायता करे

जिसके पास साधन नही हैं |कहा है ——-

” जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम ,

दोऊ हाथ उलीचिए यह सज्जन का काम |”