एक ऐसे संत ,भक्त, समाज सुधारक , फकीर थे कि आज तक न ऐसा कोई हुआ न शायद होगा | भक्त की बात कीजिए तो ऐसा कोई भक्त नही हुआ जो कह सके

“मैं तो मुतिया राम का जित खेचो उत् जाऊ ” इतनी बफादारी ,इतना समर्पण ,इतना विश्वास कि “जित खेचो उत् जाऊ ” कहीं शंका नही और वे स्वामी के लिए मोतिया

{कुत्ता } बनने से भी इनकार नहीं |

संत की बात करें तो कैसा संत वह जो कहता है “जो घर बारे {जलाए }आपनो चले हमारे संग | माया -मोह नहीँ लगाव नहीँ ,लोभ -लालच नहीँ |जो अपना ही नहीँ

सबका भला चाहता है | चेतावनी भी देता है ” तेरी गठरी में लागा चोर ,मुसाफिर जाग जरा |”

समाज सुधारक की बात करें तो ऐसा व्यक्ति जो खुले आम सबकी बुराई करता है —

१    “अरे ! इन दोऊ राह न पाई !

२ साधो देखो जग बौराना

साँच कहो तो मारन धावे झूठे जग पतियाना

हिंदू कहै मोहि राम पियारा तुरक कहै रहमाना||

३ कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लई बनाय ,

ता पर मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय |

४ पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड ,

घर की चाकी कोई न पूजे जाको पीसो खाय |

कबीर जैसा कोई फ़कीर क्या कोई हो सकता है —–

जो प्रेम को ही ईश्वर प्राप्ति का आधार मानता है |

१    “ढाई आखर प्रेम का पढे सों पंडित होय |”

२  ” मोकों कहाँ ढूढें रे वंदे ,मैं तो तेरे पास में ”

ऐसा फकीर है कबीर जो पग -पग पर समझता है———

“माटी कहै कुम्हार से तू क्या रुंदे मोहि ,

एक दिन ऐसा होएगा मैं रुधूगी तोहि |

२ आए हैं सो जाएगें राजा -रंक फकीर ;

एक सिहासन चढ चले एक बंधे जंजीर |

३ पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय

अबके बिछुडे कब मिले दूर पड़े हैं जाय |

गरीबों ,असहायो मजबूरो के प्रति इतनी संवेदना कि उनके प्रति अत्याचार होते देख कर वे कह उठते हैं ———–

“निर्बल को न सताइये जा की मोटी हाय ,

मुई खाल की स्वास सों स्वार भस्म हो जाय |

“बकरी पाती खात है ताकी काड़ी खाल ,

जो बकरी को खात हैं तिनके कौन हवाल |

कबीर ने जो कहा ,ठोक कर कहा | कोई लाग लगाव नहीं |खरी -खरी बात कही |सीधे -सीधे शब्दों में कही | जिससे लोग वास्तविकता को समझें और सच्चाई के

रास्ते पर चले |

कबीर ज्ञानी थे | सच्चे साधक थे |महान समाज सुधारक थे | भक्त थे ,वह भी ऐसे जो बाह्य आडम्बर में विश्वास नहीं करते थे |वे आत्म ज्ञान पर बल देते थे |

उनका मानना था ——“आत्म ज्ञान बिना सब सूना क्या मथुरा क्या काशी |”