उत्तर कांड  {राम चरित मानस }

राम चरित मानस का बखान करना ईश्वर की तरह अनन्त है |यह वह ग्रन्थ है जिस में शिक्षित, साक्षर ,निरक्षर डूब -डूब जाते हैं | भक्ति की दृष्टि से ,साहित्य की

दृष्टि से सामाजिक ,राजनैतिक दृष्टि से हर क्षेत्र में अनूठा है |भक्ति का तो सागर है ,इस क्षेत्र में ऐसा ग्रन्थ दुर्लभ है |सामाजिक ,राजनैतिक नीतियों का ऐसा सुन्दर

संग्रह कहीं नहीं मिलेगा  |यह एक ऐसे समाज की स्थापना करता है ,जो हर युग में हर व्यक्ति को मान्य हो | जो सुन्दर है ,सुखद है |ऐसे पढ़ने -सुनने ,आचरण करने

वाला सांसारिक दुखों से मुक्त हो जाता है ——–“रामायण सुर -तरु की छाया , दुःख भए दूर निकट जो आवा ||”

प्रत्येक रचना का अंत ही उसका सार तत्व होता है | मानस का अंतिम खण्ड उत्तर कांड है ,जिसे उत्तम कांड कहना अतिशयोक्ति न होगी |

सम्पूर्ण मानस का सार ,तथ्य ,यथार्थ यहाँ निहित है |निकृष्ट और घृणित समझे जाने वाला कौया {काग} इसमें सर्व श्रेष्ठ हो जाता है क्योंकि श्री राम की भक्ति में

आकर कोई भी प्राणी अधम रह ही नहीं सकता | राम के नाम के बिना तो मूल्यवान वस्तु भी अर्थ हीन हो जाती है | हनुमान जी जब बहुमूल्य मोतियों की माला में

राम अंकित न देख कर ,मोती तोड़ कर फेंक देते हैं ———-“कह मारुति न नाम जेहि माही ,

सों तो काहू काम की नाही ||”

भक्ति के बिना तो गुण भी मूल्यहीन हो जाते हैं |——-“भक्ति हीन गुण सुख सब ऐसे ,

लवन बिना बहु व्यंजन जैसे ||”

यद्यपि तुलसी दास जी ज्ञान को प्राप्त करना कठिन मानते ——–“ज्ञान के पंथ कृपाण की धारा ” लेकिन भक्ति को ज्ञान से श्रेष्ठ मानते हैं | ज्ञान और भक्ति

दोनों ही दुखों का निवारण करते हैं |

” भक्तिही ,ज्ञानही नहि कछु भेदा ,
उभय हरहिं भाव संभव खेदा ||”

भक्ति तो वह परम प्रकाश देने वाला दीपक है जिसे किसी तेल -बाती की आवश्यकता नहीं————

“परम प्रकाश रूप दिन -राती ,
नहीं कछु चहिए दिया ,घृत ,बाती ||”

उत्तर कांड में राम -राज्य की स्थापना का चित्रण है |इस राज्य में कोई दुखी नहीं है | कोई दर्द नहीं ,परेशानी नहीं ,ईर्ष्या नहीं ,छल नहीं कपट नहीं ,अकाल

-मृत्यु नहीं ————-“दैहिक ,दैविक ,भौतिक तापा ,
राम राज्य काहू नहीं व्यापा  ||”

राम राज्य में सभी पर्यावरण और स्वच्छता का ध्यान रखते थे | यदि आज हम इन बातों का ध्यान रखें तो राम राज्य न सही एक सुन्दर राज्य तो हो ही सकता है |

“पनघट परम मनोहर नाना | जहाँ न पुरुष करें असनाना  ||

सुमन वाटिका सबहि लगाई |विविध भांति कर जतन बनाई ||”

मनुष्य जीवन सम्पूर्ण प्राणियों में श्रेष्ठ है |इसमें व्यक्ति को कार्य करने का अधिकार मिलता है ———–

बड़े भाग्य मानुष तन पावा ,सुर दुर्लभ सत् ग्रंथन गावा |”

मनुष्य स्वयं ईश्वर का अंश है ———-“ईश्वर अंश जीव अविनाशी ” कह कर गोस्वामी जी ने आत्मा और परमात्मा के समबन्ध को स्पष्ट किया है |वहीं संसार की

निस्सारता से भी अवगत कराया है ———-“सत हरि भजन ,जगत सब सपना |”

इस कांड में तुलसी दास जी ने ऐसे प्रश्नों को उठाया है जिनके बारे में हर कोई जिज्ञासा रखता है |कहीं इन प्रश्नों को पक्षिराज गरुण के माध्यम से पूछा है तो कहीं

भक्तों के माध्यम से |

पक्षिराज गरुण ने सात प्रश्न काग भाशुंड से पूछे ————-

१ प्रश्न ——सर्वश्रेष्ठ प्राणी कौन है ?

उत्तर —-“नर तनु सम नहीं कवनिउ देही  ”

२ सबसे बड़ा दुःख क्या है ?

उत्तर –“नहीं दरिद्र सम दुःख जग माही |”

३ प्रश्न सबसे बड़ा सुख क्या है ?

उत्तर —“संत मिलन सम सुख कछु नाहीं  |”

४  प्रश्न -संत कौन है ?

उत्तर “पर उपकार वचन मन काया |

संत सहज स्वभाव खग राया ||”

५ प्रश्न -असंत कौन है ?

उत्तर —“सन इव सम खल बंधन करई |

खाल कढाई विप्पति सह मरई ||”

६ -प्रश्न -सबसे बड़ा धर्म क्या है ?

उत्तर –परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा ”

७  प्रश्न –सबसे बड़ा पाप क्या है ?

“पर निंदा सम अध् न गरिसा ”

तुलसी दास जी ने संत और असंतों के आचरणों को स्पष्ट किया है {इसे आप संत -असंतों की पहचान में पढ़ सकते हैं } उन्होंने उन नीतियों का उल्लेख भी किया

है जिनसे सुन्दर ,सुखद समाज की रचना होती है | आज ये बहुत प्रासंगिक हैं | आज गुरु का ध्यान ,शिष्य की शिक्षा पर कम धन पर अधिक होता है ———–

“हरें शिष्य धन ,शोक न हरई |
सो गुरु घोर नरक मंह  परई  ||”

शिष्यों को भी “हरि ,गुरु निंदक दादुर {मेढक }होई ” कह कर चेतावनी दी है |

गोस्वामी जी ने लोगों की कमजोरियों को समझा और कहा ————

१   सुत वित् लोक ईशाना तीनी |

केहि की मति इन कर न मलीनी |”

सुत {पुत्र मोह ,वित् -धन लोभ  ,लोक ईषना -यश  चाह}

२   “मोह न अंध कीन्ह केहि कही |

को जग काम नचाव न जेही ||”

इन सब से बचने का उपाय है सत्संग | सत्संग से से ज्ञान प्राप्त होता है  ,ज्ञान से प्रेम का प्रसार और प्रेम से ईश्वर की प्राप्ति होती है —–

” मिलहि न रघुपति बिन अनुरागा ,

किए जोग ,तप ,ज्ञान विरागा ||”

जहाँ न पहुचे रवि ,वहाँ पहुचे कवि “की उक्ति को चरितार्थ करते हुए तुलसीदास जी ने भविष्य के बारे में जो अनुमान लगाए ,आज वे कितने यथार्थ हैं

यह जाना जा सकता है ———-

१  “मातु -पिता बालकन्ह बुलावह |

उदर भरह सोई धर्म सिखावहि ||”

२ “जेहि ते कछु निज स्वारथ होई

तेहि पर ममता करि सब कोई ||”

३ “पंडित सोई जो गाल बजावा ”

४ “जो कछु झूठ मसकरी जाना |

कलियुग सोई गुणवंत बखाना ||”

५ ससुराल पियारी लगी जब ते ,

रिपु रूप कुटुंब भए तबते ||”

उत्तर कांड ,राम चरित मानस का उत्तम कांड है |जो अच्छाईयों -बुराईयों का ,संत असंत का ,संगति -कुसंगति का ,भक्ति और माया का

पूर्णत: खुलासा कर सत्मार्ग पर चलने का मार्ग प्रशस्त करता है |श्री राम की पावन कथा का उल्लेख कर मोक्ष पाने का साधन भी सुझाया है ,जो अन्य युगों की तुलना

में सरल है —-
“कलियुग योग लोग नहि जाना |

एक अधार राम गुण गाना   ||”

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