पापा


मुझे दो हजार रुपए चाहिएमनोज ने अपने पिता ग्रह मंत्री श्री नारायण सिंह से कहा |
लो बेटापिता ने जेब मैं हाथ डाला और बिना गिने ही नोटों की गड्डी उसे थमा दी |पिता को अनेक चुम्बनों का उपहार देकर ,मनोज खुशी से उछलता हुआ वहां से चला गया |
मीरा देवी यह सब देख कर अवाक् रह गयी और आज फ़िर चाहते हुए भी पति से उलझ पडी कि आपने बिना पूछे रुपए क्यों दिए |वह क्या करता है ,कहाँ जाता है ?उसे रुपए क्यों चाहिए ?यह पूछना ही चाहिए था |
पति ने लापरवाही से क्रोध भरी नजर पत्नी पर डाली और कहाजवान लड़का है उससे पूछना क्या ?जो करेगा ,ठीक ही करेगा
लेकिन बच्चे को इतने रुपए नही देने चाहिएमीरा देवी ने प्रतिवाद किया |
तो क्या उसे दो रुपए दे देतावह किसी क्लर्क का बेटा नहीं गृह मंत्री का बेटा है \नारायण सिंह ने गर्व से गर्दन झटकी और चले गये
जिस दिन से पति गृह मंत्री बने उस दिन से जनता के शोषण का पैसा निरंतर घर की सम्रद्धि को बढाता चला जा रहा था |लेकिन मीरा देवी इससे खुश थी |एक प्रधानाचार्य की बेटी जो थी ,उत्तम संस्कारों में पली वह इन नवीन संस्कारों को अपना पा रही थी |निरंतरयह शोषण का पैसा उनका मानसिक शोषण कर रहा था |वह प्रत्येक छणएक घुटन सी महसूस करती थी ,एस आलीशान बंगले में ,जिसमें सुख सुविधायों की कोई कमी थी |पति को नाश्ता कराते समय उन्होंने बच्चों का पुनः प्रसंग उठाया की आप बंच्चों को सोचसमझ कर सुविधाएँ दें क्योंकि ये सुविधाएँ बच्चों को सही रास्ते से भटका सकती है |नारायण सिंह झल्ला पडे |तुम स्त्रियों से भगवान बचाए |